मन को सुमन बनाना है मनोगुप्ति की साधना : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण

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लाडनूं : जैन श्वेतांबर तेरापंथ के वर्तमान अनुशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने गुरुवार को सुधर्मा सभा में आयोजित मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आगम के माध्यम से पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि आज चतुर्दशी हाजिरी का दिन है। साधु की आचार व्यवस्था में तीन गुप्तियों मनोगुप्ति, वचनगुप्ति और कायगुप्ति का विशेष विधान है। जिसमें मन का संरक्षण और मन को दुष्प्रवृत्तियों से बचाना सर्वोपरि है।

मन में हिंसा, राग, द्वेष, आवेश, छल, अहंकार, लोभ या घृणा का संकल्प जागना भी पाप का हेतु है। जिस प्रकार सिनेमा के पर्दे पर अनेक दृश्य आते और जाते रहते हैं, वैसे ही मन के चित्रपट पर भी निरंतर विचार और प्रमादात्मक वृत्तियां उभरती रहती हैं। शारीरिक क्रिया तो दूसरों को दिख जाती है, परंतु मन के भाव सामान्यतः दूसरों को दिखाई नहीं देते। मन का चंचल होना एक ‘कार्य’ है, परंतु उस चंचलता का मूल संचालक कौन है, यह जानना आवश्यक है। धीर पुरुष समस्या के साथ-साथ उसके मूल कारण पर ध्यान देते हैं। मन को चंचल बनाने वाला भीतर का भाव-जगत राग-द्वेष है।

आदमी को मन की चंचलता को कम करने पर विशेष ध्यान देने का प्रयास करना चाहिए और राग-द्वेष के भाव को कम करने का प्रयास करना चाहिए। आगम के अनुसार मन चार प्रकार का होता है: सत्य मन, मृषा मन, सत्य-मृषा मन तथा असत्य-मृषा मन। आदमी को अपने मन का मालिक बनने का प्रयास करना चाहिए।

यदि हम मन के कहे अनुसार चलेंगे तो मन मालिक और हम उसके नौकर बन जाएंगे। आत्मा/चित्त को मालिक होना चाहिए और मन को उसका अनुगामी (सेवक) होना चाहिए। मन को अशुभ से हटाकर ‘सुमन’ अर्थात् कल्याणकारी संकल्प वाला बनाए रखना ही मनोगुप्ति की साधना है।

आचार्यश्री ने चतुर्दशी के सन्दर्भ में चारित्रात्माओं को विविध प्रेरणाएं प्रदान कीं। आचार्यश्री की अनुज्ञा से बालसाध्वी पद्मप्रभाजी व साध्वी चन्दनप्रभाजी ने लेखपत्र उच्चरित किया। आचार्यश्री ने साध्वीद्वय को दो-दो कल्याणक बक्सीस किए। तदुपरांत उपस्थित चारित्रात्माओं ने अपने-अपने स्थान पर खड़े होकर लेखपत्र उच्चरित किया।