राग से मुक्ति ही वीतरागता की राह, भौतिक सुख नहीं आत्मिक आनंद है धर्म का लक्ष्य

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जयपुर :  संसार में मनुष्य का अधिकांश जीवन राग और आसक्ति के इर्द-गिर्द घूमता है। जब तक शरीर और इंद्रियों के सुख की चाह मन पर हावी रहती है, तब तक धर्म और अध्यात्म में वास्तविक रस उत्पन्न होना कठिन है। वीतरागता की साधना के लिए सूक्ष्म दृष्टि से अपने भीतर के राग भाव को पहचानना और उससे मुक्त होने का प्रयास आवश्यक है। यह विचार मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ ने गुरुवार को अणुविभा केन्द्र, मालवीय नगर में ‘वीतरागता’ विषय पर आयोजित कार्यशाला को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।

मुनिश्री ने कहा कि ‘संसार खारा और वैराग प्यारा’ कहना जितना सरल है, उसे आचरण में उतारना उतना ही कठिन है। संसार राग से भरा हुआ है और मनुष्य को जिस रस की अनुभूति राग में होती है, वह वैराग में सहजता से अनुभव नहीं होती। उन्होंने कहा कि द्वेष को पहचानना अपेक्षाकृत सरल है, लेकिन राग को समझना और उसके सूक्ष्म स्वरूप को पकड़ पाना कठिन है। राग का धागा अत्यंत बारीक होता है, इसलिए उसे पहचानने के लिए सूक्ष्म और जागरूक दृष्टि चाहिए।

उन्होंने कहा कि संसार में राग की स्थिति इतनी गहरी है कि कई बार मनुष्य राग को ही दया और करुणा समझ लेता है। आध्यात्मिक साधना का उद्देश्य बाहरी सुखों की वृद्धि नहीं, बल्कि भीतर की आसक्ति को कम करते हुए आत्मिक शांति की ओर बढ़ना है।

मुनिश्री संभव कुमार जी ने कहा कि द्वेष की उत्पत्ति भी राग से होती है, इसलिए केवल द्वेष को समाप्त करने के बजाय राग का उपचार करना आवश्यक है। जैन दर्शन मूलतः वीतरागता का दर्शन है। ममत्व भाव के समाप्त होने पर ही मनुष्य संसार के बंधनों से मुक्त होकर मोक्ष की दिशा में आगे बढ़ सकता है।

उन्होंने कहा कि राग प्रियता को जन्म देता है और प्रियता श्रेय की प्राप्ति में बाधक बनती है। आज धार्मिक जीवन में भी कई बार शरीर के सुख को ही धर्म समझ लिया जाता है, जबकि धर्म का वास्तविक लक्ष्य वीतरागता, आत्मिक सुख और आत्मरमण है। उन्होंने श्रद्धालुओं से भौतिक सुखों में उलझने के बजाय आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने का आह्वान किया।

कार्यक्रम में श्रीमती कृतिका हितेश जी कोचर, पुत्रवधु श्री प्रदीप जी एवं श्रीमती जयश्री जी कोचर, के मासखमण (एकासन) तप की अनुमोदना की गई। तेरापंथ महिला मंडल की अध्यक्षा श्रीमती कौशल्या जी जैन ने तपस्विनी बहिन का परिचय देते हुए उनके तप की अनुमोदना की। मंडल की बहिनों ने सामूहिक गीत प्रस्तुत किया।

इस अवसर पर मुनिश्री ने तेरापंथ धर्म संघ के संविधान का वाचन किया। श्री आलोक जी हीरावत, मुख्य ट्रस्टी, श्री जैन श्वेताम्बर तेरापंथ सभा ने श्रावक निष्ठा पत्र की शपथ दिलाई। कार्यक्रम का शुभारंभ तीर्थंकर सुमतिनाथ जी की स्तुति से हुआ तथा मंगलपाठ, त्याग और प्रत्याख्यान के साथ समापन हुआ।