पर्वाधिराज पर्युषण : महातपस्वी महाश्रमण की मंगल सन्निधि में आध्यात्मिक शुभारम्भ

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लाडनूं : तेरापंथ की राजधानी लाडनूं की धरा पर योगक्षेम वर्ष का महामंगल प्रवास कर रहे जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में पर्वाधिराज पर्युषण का भव्य एवं आध्यात्मिक रूप में आगाज हुआ। इन आठ दिनों में चतुर्विध धर्मसंघ अपने आराध्य की सन्निधि में अपने जीवन को उन्नत बनाने के लिए आध्यात्मिक साधना के विशेष उपक्रमों के साथ जुड़ेगा। इस आध्यात्मिक आयोजन के महापर्व में भागीदार बनने के लिए देश-विदेश से श्रद्धालु अपने आराध्य की मंगल सन्निधि में उपस्थित हो चुके हैं।
मंगलवार को प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व ही करीब साढ़े चार बजे से ही श्रद्धालु अपने आराध्य की मंगल सन्निधि में अर्हत्-स्तुति वंदना, बृहद् मंगलपाठ आदि के लिए उपस्थित हुए। तदुपरान्त प्रेक्षाध्यान, 25 बोल पर आधारित तात्विक विश्लेषण, आगम स्वाध्याय के बाद चतुर्विध धर्मसंघ ने अपने अनुशास्ता के श्रीमुख से मंगल प्रवचन का श्रवण किया। उसके बाद कायोत्सर्ग, जप प्रयोग, आगम वाचन, अनुप्रेक्षा, आध्यात्मिक संबोध, पुनः सायं छह बजे से गुरुवंदना, प्रतिक्रमण, अर्हत्वंदना व रात्रिकालीन सत्संग कार्यक्रम से भी जुड़े। यह अष्टदिवसीय आयोजन जन-जन के मानस को आध्यात्मिकता से भावित करेगा।
मंगलवार को प्रातःकालीन मंगल प्रवचन कार्यक्रम में युगप्रधान अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी के पदार्पण से पूर्व पर्युषण पर्वाधिराज का प्रथम दिन जो खाद्य संयम दिवस के रूप में समायोजित होता है तो साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभाजी ने उपस्थित जनमेदिनी को खाद्य संयम दिवस के संदर्भ में उद्बोधित किया। तदुपरान्त महातपस्वी आचार्यश्री मंचासीन हुए और नमस्कार महामंत्रोच्चार किया। साध्वीवर्या सम्बुद्धयशाजी ने पर्युषण के  महत्व को व्याख्यायित किया।
पर्वाधिराज पर्युषण के दौरान दस धर्मों की व्याख्या का भी आयोजन होता है। युवाचार्यश्री महावीरकुमारजी ने दस धर्मों में से एक मुक्ति धर्म पर अपना उद्बोधन प्रदान किया। भगवान महावीर के प्रतिनिधि, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने पर्युषण पर्वाधिराज के अवसर पर ‘भगवान महावीर की अध्यात्म यात्रा’ के प्रसंग का शुभारम्भ करते हुए कहा कि परमात्मा महावीर की अध्यात्म यात्रा का वर्णन पर्युषणकाल के मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में किया जाता है। आज से जैन श्वेताम्बर तेरापंथ परंपरा का अतिमहत्त्वपूर्ण पर्व पर्युषण का शुभारम्भ हुआ है। भाद्रव महीने में इस पर्व का पदार्पण होता है। इससे ही जुड़ा हुआ भगवती संवत्सरी का सर्वोच्च दिन होता है, जिसकी आराधना की जाती है। चतुर्मास में यों तो चार महीने होते हैं, उनका यथासंभव अच्छा उपयोग हो सकता है। चतुर्मास का पूर्वाध भगवती संवत्सरी तक का समय त्याग, तपस्या आदि की दृष्टि से कुछ अतिरिक्त महत्त्व वाला होता है। यह समय अपने आप में महिमा मण्डित वाला है। यह आध्यात्मिक साधना का विशेष समय होता है।
आचार्यश्री ने भगवान महावीर की अध्यात्म यात्रा के दौरान नयसार भव का वर्णन करते हुए नयसार द्वारा साधु-संतों को भोजन आदि का दान दिया और रास्ता बताने के लिए मार्गसेवा में साथ चले। संतों ने उन्हें उपदेश दिया। साधुओं का तो यह उपकार कार्य होता है कि किसी को उपदेश देना, ज्ञान देना। नयसार ने साधुओं को वंदन किया। नयसार को सम्यक्त्व की प्राप्ति हो जाती है। आचार्यश्री ने आगे कहा कि आज भाद्रव कृष्णा द्वादशी है, आज का दिन हमारे धर्मसंघ से भी जुड़ा हुआ है। आज का दिन हमारे धर्मसंघ चतुर्थ आचार्य प्रज्ञापुरुष श्रीमज्जयाचार्य का महाप्रयाण दिवस है। श्रीमज्जयाचार्य एक ज्ञानी व्यक्तित्व थे। बाल्यावस्था में ही उनकी दीक्षा हो गई। बाद में धर्मसंघ के चतुर्थ आचार्य के रूप में प्राप्त हुए। उन्होंने धर्मसंघ के उन्नयन के अनेक कार्य किए। आचार्यश्री ने उनसे संदर्भित गीत का आंशिक संगान किया। आचार्यश्री ने खाद्य संयम दिवस पर लोगों को खाने में संयम करने की प्रेरणा प्रदान की।
मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने मुमुक्षु दिनेश को आचार्यश्री ने साधु प्रतिक्रमण सीखने की अनुमति प्रदान की।