जयपुर : जैन धर्म के आध्यात्मिक एवं आत्मशुद्धि के सर्वोपरि पर्व पर्युषण महापर्व की आराधना का शुभारम्भ सोमवार को मालवीय नगर स्थित अणुविभा केन्द्र में श्रद्धा, उल्लास और आध्यात्मिक वातावरण के बीच हुआ। महाप्रज्ञ सभागार में आयोजित कार्यक्रम में साधु-संतों के सान्निध्य में श्रद्धालुओं ने पर्युषण पर्व के आध्यात्मिक महत्व को समझते हुए आत्मचिंतन और संयम की ओर कदम बढ़ाया। पर्व के प्रथम दिन को ‘खाद्य संयम दिवस’ के रूप में मनाया गया।
महापर्व के शुभारम्भ अवसर पर मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ ने कहा कि धर्म कोई मौसमी फल नहीं, बल्कि बारहमासी फल है। धर्म की साधना और आराधना केवल किसी विशेष पर्व या अवसर तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि जीवन के प्रत्येक दिन और प्रत्येक पल में धर्म का आचरण होना चाहिए। धर्म मनुष्य के जीवन में आनंद, तृप्ति और प्रसन्नता का संचार करता है।
उन्होंने कहा कि इस वर्ष पर्युषण पर्व का आयोजन 8 से 15 सितम्बर तक निर्धारित है, लेकिन वास्तविक अर्थों में पर्युषण केवल आठ दिनों का पर्व नहीं है। यह आत्मा में रमण करने और स्वयं के भीतर लौटने का अवसर है। ये आठ दिन जीवन पर चढ़े आठ कर्मों के भार को हल्का करने के लिए एक स्वर्णिम अवसर के समान हैं।
त्याग और तपस्या से सुरक्षित रहती है धरती
मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ने अर्हत वाणी का उल्लेख करते हुए कहा कि एक बार गौतम स्वामी ने भगवान महावीर से पूछा कि यह धरती किसके कारण सुरक्षित है। भगवान महावीर ने बताया कि यह धरा त्यागी और तपस्वियों के कारण आरक्षित एवं सुरक्षित है।
उन्होंने कहा कि जब तक इस धरती पर तीर्थंकरों, लब्धिधारी संतों, केवलियों, सर्वज्ञों तथा त्यागी-तपस्वी साधु-संतों का विचरण होता रहेगा, तब तक समुद्र सहित प्रकृति के अन्य तत्व भी अपनी मर्यादा का उल्लंघन नहीं करेंगे। त्याग, तप और संयम केवल व्यक्ति के जीवन को ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि के संतुलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
‘जीभ सुधर गई तो जीवन सुधर गया’
पर्युषण के प्रथम दिन निर्धारित ‘खाद्य संयम’ विषय पर मुनिश्री ने कहा कि साधना के साथ-साथ स्वस्थ जीवन के लिए भी खाद्य संयम आवश्यक है। उन्होंने सारगर्भित सूत्र देते हुए कहा—“जीभ सुधर गई तो जीवन सुधर गया।”
उन्होंने भोजन के संबंध में कहा कि भोजन हितकर, मितकर, ऋतकर और पुष्टिकर होना चाहिए। भोजन केवल स्वाद की तृप्ति के लिए नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और जीवन को बनाए रखने के लिए किया जाना चाहिए। उन्होंने श्रद्धालुओं को सचेत करते हुए कहा कि भोजन को दबा-दबाकर नहीं, बल्कि अच्छी तरह चबा-चबाकर करना चाहिए।
मुनिश्री ने कहा कि मनुष्य को यह स्मरण रखना चाहिए कि हम खाने के लिए नहीं, बल्कि जीने के लिए खाते हैं। स्वाद पर नियंत्रण और भोजन में संयम जीवनशैली को स्वस्थ एवं संतुलित बनाने का महत्वपूर्ण माध्यम है।
इस अवसर पर मुनिश्री ने काल और तीर्थंकरों से जुड़े अनेक आध्यात्मिक एवं ज्ञानवर्धक प्रसंगों की जानकारी भी दी। वहीं ‘भरत मुक्ति’ के गेय व्याख्यान के माध्यम से चक्रवर्ती भरत की महिमा का आध्यात्मिक वर्णन किया गया।
बहिर्मुखता से अन्तर्मुखता की यात्रा है पर्युषण
मुनिश्री संभव कुमार जी ने पर्युषण पर्व पर आधारित गीत का संगान करते हुए कहा कि पर्युषण मनुष्य को बहिर्मुखता से अन्तर्मुखता की ओर लौटने का अवसर देता है। उन्होंने कहा कि समाधान और विशिष्ट ज्ञान की प्राप्ति उसी व्यक्ति को होती है, जो अपने भीतर की यात्रा प्रारम्भ करता है।
खाद्य संयम पर उन्होंने कहा कि व्यक्ति को भोजन के प्रति अत्यधिक आसक्त होकर ‘भोजन भट्ट’ नहीं बनना चाहिए। आवश्यकता से अधिक भोजन शरीर के लिए हानिकारक हो सकता है और अजीर्ण जैसी समस्याओं का कारण बन सकता है। इसलिए भोजन में मात्रा, समय और आवश्यकता—तीनों का विवेक आवश्यक है।
‘विज्ञ धम्म माहिए’ क्वीज प्रतियोगिता आयोजित
कार्यक्रम के दौरान तेरापंथ महिला मंडल शहर की ओर से ‘विज्ञ धम्म माहिए’ क्वीज प्रतियोगिता का आयोजन भी किया गया। प्रतियोगिता में श्राविका समाज ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।
तेरापंथ महिला मंडल की अध्यक्षा श्रीमती कौशल्या जी जैन ने बताया कि प्रतियोगिता में बड़ी संख्या में श्राविकाओं ने सहभागिता की। आयोजन का उद्देश्य धार्मिक ज्ञान के प्रति रुचि बढ़ाने के साथ-साथ पर्युषण महापर्व के आध्यात्मिक संदेश को जन-जन तक पहुंचाना रहा।
पर्युषण महापर्व का यह शुभारम्भ श्रद्धा, संयम और आत्मचिंतन का संदेश लेकर आया। पर्व का मूल भाव यही है कि मनुष्य कुछ समय के लिए संसार की बाहरी दौड़ से स्वयं को अलग कर अपने भीतर झांके, अपनी भूलों को पहचाने और आत्मशुद्धि के मार्ग पर आगे बढ़े।








