डेस्क : फर्जी डॉक्टरों और जाली मेडिकल डिग्रियों की पहचान के लिए सत्यापन व्यवस्था की मांग करने वाली जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को सख्त टिप्पणी की। न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने जनहित याचिकाओं के लगातार दाखिल किए जाने पर नाराजगी जताते हुए याचिका खारिज कर दी।
यह याचिका अधिवक्ता एनके गोस्वामी ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर की थी। इसमें नेशनल मेडिकल कमीशन से यह जानकारी उपलब्ध कराने की मांग की गई थी कि किसी व्यक्ति को चिकित्सा पेशे में प्रवेश देने या उसे प्रैक्टिस की अनुमति देने से पहले उसकी मेडिकल डिग्री और योग्यता के सत्यापन के लिए क्या प्रक्रिया अपनाई जाती है।
सुनवाई के दौरान पीठ ने याचिकाकर्ता से जनहित याचिकाओं के उद्देश्य और उनके आधार को लेकर सवाल किए। अदालत ने मौखिक टिप्पणी में कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि याचिकाकर्ता अखबारों में खबरें देखकर रिट याचिकाएं तैयार कर रहे हैं। पीठ ने यह भी कहा कि अदालत में ऐसी याचिकाएं दाखिल करने से पहले उनके आधार और मांगों पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि मामला मरीजों की सुरक्षा से जुड़ा है। उन्होंने फर्जी डॉक्टरों और जाली मेडिकल डिग्रियों को गंभीर समस्या बताते हुए कहा कि फर्जी मेडिकल डिग्री केवल कागज का टुकड़ा नहीं है, बल्कि अस्पताल में मरीजों की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा हो सकती है।
याचिका में नेशनल मेडिकल कमीशन से मेडिकल पेशे में प्रवेश और प्रैक्टिस की अनुमति से पहले अपनाई जाने वाली सत्यापन प्रक्रिया की जानकारी मांगी गई थी। याचिकाकर्ता ने अपनी दलील के समर्थन में कुछ रिपोर्टों का भी हवाला दिया, जिनमें फर्जी डॉक्टरों की संख्या को लेकर चिंता जताई गई थी।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को स्वीकार नहीं किया और इसे खारिज कर दिया। याचिका में अनुच्छेद 14 और 21 के तहत मौलिक अधिकारों तथा नेशनल मेडिकल कमीशन अधिनियम, 2019 के प्रावधानों के प्रभावी क्रियान्वयन की मांग की गई थी।
अदालत की टिप्पणी के बाद जनहित याचिकाओं के जरिए व्यापक नीतिगत या प्रशासनिक मुद्दे उठाने के तरीके को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है।








