जयपुर : निर्माण नगर स्थित एक स्थानीय विद्यालय के नवनिर्मित संबोधि सभागार में शनिवार को आयोजित धर्मसभा में जैन संत मुनि श्री तत्व रुचि ‘तरुण’ ने “ज्ञान का सार है—आचार” विषय पर प्रवचन देते हुए कहा कि सदाचार और सद्चरित्र जीवन की सर्वोच्च संपत्ति हैं। उन्होंने कहा कि अपने व्यवसाय और कार्यक्षेत्र में ईमानदारी बनाए रखना प्रत्येक व्यक्ति की नैतिक जिम्मेदारी है।
मुनि श्री ने कहा कि ईमानदारी से किया गया कार्य समाज में विश्वास का निर्माण करता है। यह विश्वास व्यक्ति की सबसे अमूल्य निधि होता है। उन्होंने कहा कि संसार में ईमानदारी से श्रेष्ठ कोई नीति नहीं है और यह चरित्रवान व्यक्ति का सर्वोत्तम गुण है। उन्होंने उपस्थित श्रद्धालुओं को सत्यनिष्ठा एवं ईमानदारी के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी।
इस अवसर पर मुनि श्री संभव कुमार ने चरित्र की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जीवन में चरित्र का स्थान सर्वोपरि है। उन्होंने कहा कि धन का नष्ट होना बड़ा नुकसान नहीं है, स्वास्थ्य का नष्ट होना कुछ हानि अवश्य है, किंतु यदि चरित्र नष्ट हो जाए तो समझना चाहिए कि सब कुछ समाप्त हो गया। चरित्रवान व्यक्ति ही वास्तव में मूल्यवान और महान कहलाता है।
मुनि श्री ने आचार की महत्ता का उल्लेख करते हुए कहा कि ज्ञान प्राप्ति का मूल उद्देश्य आचरण की पवित्रता है। ज्ञान तभी सार्थक है जब वह व्यक्ति को सदाचार की ओर अग्रसर करे। उन्होंने कहा कि आचार ही ज्ञान का वास्तविक सार है।
कार्यक्रम का शुभारंभ तीर्थंकर मल्ली प्रभु की स्तुति के साथ हुआ। संतों ने श्रद्धालुओं को साधना की गहराई का अनुभव कराने के लिए ध्यान एवं योग के विशेष प्रयोग भी करवाए।
प्रवचन के उपरांत पडिहारा निवासी एवं जयपुर प्रवासी स्वर्गीय पन्नालाल सुराणा की स्मृति में श्रद्धांजलि सभा आयोजित की गई। संतों ने शोकाकुल परिवार को आध्यात्मिक संबल प्रदान करते हुए दिवंगत आत्मा के प्रति श्रद्धा व्यक्त की। इस अवसर पर उनकी पुत्रवधु श्रीमती सरिता सुराणा, पौत्र स्वस्तिक सुराणा सहित अनेक परिजनों एवं श्रद्धालुओं ने श्रद्धासुमन अर्पित किए।
सभा का संचालन मृणाल दुगड़ ने किया। श्री जैन श्वेताम्बर तेरापंथी सभा के अध्यक्ष शांतिलाल गोलछा ने भी स्वर्गीय पन्नालाल सुराणा को श्रद्धांजलि अर्पित की।


