जयपुर : अणुविभा केन्द्र, मालवीय नगर में सोमवार को मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ के सान्निध्य में ‘व्यक्तित्व विकास और अध्यात्म’ विषय पर आध्यात्मिक सेमिनार का आयोजन किया गया। श्री जैन श्वेताम्बर तेरापंथी सभा के अंतर्गत आयोजित इस कार्यक्रम में चेन्नई, सूरत, अहमदाबाद, बैंगलोर, कोलकाता, बीकानेर सहित विभिन्न क्षेत्रों से आए श्रद्धालुओं ने बड़ी संख्या में सहभागिता की।
सेमिनार को संबोधित करते हुए मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ ने कहा कि व्यक्तित्व का विकास व्यक्ति की सोच पर निर्भर करता है। दुनिया में बड़ा इंसान वही है, जिसका दिल बड़ा है। ऊंची और अच्छी सोच व्यक्तित्व को निखारती है और व्यक्ति को महानता की ओर ले जाती है। उन्होंने कहा कि महानता पद और पैसे से नहीं, बल्कि उदारता, उदात्त चिंतन और उदार व्यवहार से प्राप्त होती है।
आगम आधारित अपने संदेश में मुनिश्री ने तप की आध्यात्मिक व्याख्या करते हुए कहा कि तप का मूल उद्देश्य आत्मशुद्धि है। बाहरी वस्तुओं का त्याग भी तप है और कषायों का त्याग अथवा उनका अल्पीकरण भी तप का महत्वपूर्ण स्वरूप है। उन्होंने कहा कि क्रोध आदि कषायों को छोड़ना अपने आप में बड़ा तप है और आत्मशुद्धि के लिए कषायों से मुक्त होना आवश्यक है।
मुनिश्री संभव कुमार जी ने कहा कि विनम्रता, परहित की भावना, वाणी में मधुरता, क्षमा, उच्च चिंतन और व्यवहार कुशलता जैसे गुण व्यक्ति को वास्तविक ऊंचाई प्रदान करते हैं। उन्होंने अपने सुमधुर गीत के माध्यम से भी उपस्थित श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक संदेश दिया।
कार्यक्रम का शुभारंभ तीर्थंकर पद्मप्रभु की स्तुति से हुआ। इसके पश्चात ध्यान एवं तप-प्रत्याख्यान के आध्यात्मिक उपक्रम संपन्न हुए। पूरे आयोजन में अध्यात्म, आत्मचिंतन और व्यक्तित्व के आंतरिक विकास का संदेश प्रमुख रूप से उभरकर सामने आया।








