जयपुर : मालवीय नगर स्थित अणुविभा केंद्र के महाप्रज्ञ सभागार में मंगलवार को ‘धर्म कथा का आध्यात्मिक महत्त्व’ विषय पर विशेष कार्यशाला आयोजित हुई। तेरापंथ युवक परिषद के तत्वावधान में आयोजित इस कार्यशाला में मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ एवं मुनिश्री संभव कुमार जी का सान्निध्य प्राप्त हुआ। कार्यशाला में विभिन्न क्षेत्रों से आए प्रतिनिधियों ने सहभागिता की।
कार्यशाला को संबोधित करते हुए मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ ने कहा कि “अनुभूत सत्य कथन की महिमा निराली है। लिखा हुआ बोलना और भोगा हुआ बोलना, दोनों में बड़ा अंतर है। वस्तुतः अनुभूत सत्य ही वास्तविक होता है।” उन्होंने कहा कि व्यक्ति को सत्य की खोज स्वयं करनी चाहिए। स्वयं द्वारा खोजा गया सत्य ही व्यक्ति का अपना सत्य होता है, जबकि सुना हुआ अथवा पढ़ा हुआ सत्य उधार का होता है।
मुनिश्री ने भगवान महावीर की वाणी का उल्लेख करते हुए कहा कि धर्म के मर्म को केवल पढ़ने की अपेक्षा उसके अनुभव और अनुभूति से अधिक सहजता से समझा जा सकता है। धर्म मंगल है और इसकी वास्तविक अनुभूति वही व्यक्ति कर सकता है, जो धर्म को अपने जीवन में जीता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि गुड़ की मिठास का अनुभव वही कर सकता है, जिसने गुड़ का सेवन किया हो। इसी प्रकार धर्म की अनुभूति भी उसके आचरण और साधना से ही संभव है।
मुनिश्री संभव कुमार जी ने कहा कि धर्म मंगलकारी और उत्तम है। यह आत्मशुद्धि का महत्वपूर्ण साधन है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने वर्तमान को सुंदर बनाने और भविष्य को संवारने के लिए धर्म-ध्यान करना चाहिए। उन्होंने कहा कि धर्म कथा धर्म प्रभावना का महत्वपूर्ण उपक्रम है और धर्म कथा के माध्यम से संचित कर्मों को क्षीण करने की दिशा में साधना का मार्ग प्रशस्त होता है।
इस अवसर पर श्रीमती ममता जी पटोलिया, धर्मपत्नी श्री मनीष जी पटोलिया ने मुनिश्री से आठ की तपस्या का प्रत्याख्यान किया। उपस्थित श्रद्धालुओं ने तपस्विनी बहिन की तपस्या की अनुमोदना की।
कार्यक्रम में श्री जैन श्वेतांबर तेरापंथ सभा के सहमंत्री श्री सुरेश जी बरड़िया, श्रीमती प्रेम बाई जी मेहता, श्रीमती जतन देवी जी भंडारी, श्रीमती सर्जना जी बोहरा, श्रीमती विमला जी जैन सहित अन्य श्रद्धालु उपस्थित रहे। इस दौरान उपस्थितजनों ने तपस्विनी बहिन को साहित्य भेंट कर उनकी तपस्या की अनुमोदना की।








