सीईसी की भूमिका पर सिंघवी ने उठाया सवाल, शेषन मामले के फैसले का दिया हवाला

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डेस्क : चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर जारी राजनीतिक विवाद के बीच कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व कानून मंत्री अभिषेक मनु सिंघवी ने मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) और अन्य चुनाव आयुक्तों के संवैधानिक दर्जे को लेकर सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले का हवाला दिया है। सिंघवी ने कहा कि चुनाव आयोग एक बहुसदस्यीय संस्था है और मुख्य चुनाव आयुक्त अन्य चुनाव आयुक्तों से ऊपर नहीं हैं।

सिंघवी के अनुसार, वर्ष 1995 में सुप्रीम कोर्ट ने तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन के कार्यकाल से जुड़े मामले में चुनाव आयोग की संरचना पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी। उन्होंने कहा कि अदालत ने चुनाव आयुक्तों को समान दर्जे वाला माना था और सीईसी को ‘बराबरों में प्रथम’ (फर्स्ट अमंग इक्वल्स) बताया था।

यह बयान ऐसे समय आया है जब एसआईआर प्रक्रिया को लेकर चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों की रिपोर्ट सामने आई है। एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों के दौरान एसआईआर से जुड़े विभिन्न फैसलों और प्रक्रियाओं पर कई बार आपत्ति जताई थी। इनमें मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने तथा फॉर्म-6 में बदलाव जैसे मुद्दे शामिल बताए गए हैं।

सिंघवी ने आरोप लगाया कि सामने आई जानकारियां चुनाव आयोग के भीतर निर्णय प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती हैं। उन्होंने सीईसी पर अपने ही सहयोगी चुनाव आयुक्तों को दरकिनार करने का आरोप भी लगाया। हालांकि, ये आरोप कांग्रेस नेता के राजनीतिक बयान हैं और इन्हें स्वतंत्र रूप से स्थापित तथ्य के रूप में नहीं देखा जा सकता।

दूसरी ओर, चुनाव आयोग ने कथित मतभेदों की व्याख्या को लेकर कहा है कि अलग-अलग आंतरिक टिप्पणियों को पूरे निर्णय-प्रक्रिया के संदर्भ से अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए। आयोग का कहना है कि पिछले एक वर्ष में पूर्ण आयोग द्वारा लिए गए फैसले सर्वसम्मति से हुए हैं।

इस पूरे घटनाक्रम के बीच मुख्य सवाल यह है कि चुनाव आयोग के भीतर मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की संवैधानिक भूमिका किस प्रकार निर्धारित होती है। सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों में आयोग को बहुसदस्यीय संस्था के रूप में देखने और उसके सदस्यों की भूमिका पर विस्तार से विचार किया गया है।