संपत्ति से अधिक जरूरी हैं सुसंस्कार, संस्कारवान संतान ही सच्ची संपत्ति : मुनिश्री तत्त्व रुचि जी

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जयपुर : मालवीय नगर स्थित अणुविभा केंद्र के महाप्रज्ञ सभागार में शनिवार को ‘संतान कैसे बने वरदान’ विषय पर आध्यात्मिक एवं प्रेरणादायी सेमिनार का आयोजन किया गया। युवा मंडल के तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम में संतान के व्यक्तित्व निर्माण, संस्कार और पारिवारिक मूल्यों को लेकर सारगर्भित विचार रखे गए।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ ने कहा कि आज संतान को संपत्ति से अधिक सुसंस्कारों की आवश्यकता है। संस्कारों के अभाव में बड़ी से बड़ी संपत्ति भी जीवन को सार्थक नहीं बना सकती। उन्होंने कहा कि संस्कारहीन संतान परिवार और समाज के लिए चुनौती बन सकती है, इसलिए बच्चों में अच्छे संस्कारों का बीजारोपण समय रहते किया जाना आवश्यक है। “संसार में जीवन का आधार संपत्ति से अधिक सुसंस्कार है। सुसंस्कारी संतान ही हमारी सच्ची संपत्ति है।” उन्होंने कहा कि माता-पिता का दायित्व केवल संतान को सुख-सुविधाएं देना नहीं, बल्कि उसे जीवन के सही मूल्यों से परिचित कराना भी है।

मुनिश्री ने सुसंस्कारी संतान के गुणों को रेखांकित करते हुए कहा कि उदार विचार, परोपकार की भावना, विनम्र व्यवहार, मधुर वाणी, बड़ों की हितकर बातों का सम्मान, सहनशीलता और धार्मिकता जैसे गुण व्यक्ति के चरित्र को ऊंचाई प्रदान करते हैं। ऐसे संस्कार ही व्यक्ति को परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदार बनाते हैं।

इस अवसर पर मुनिश्री संभव कुमार जी ने ‘बड़े घर की बेटी’ गीत का संगान करते हुए कहा कि बड़े घर की पहचान केवल धन-संपत्ति से नहीं, बल्कि बड़े दिल और उदात्त विचारों से होती है। जो व्यक्ति सभी को साथ लेकर चलता है, अपने स्वार्थ को गौण रखते हुए परहित के लिए समय और शक्ति का उपयोग करता है तथा आलस्य और आवेश से दूर रहता है, वही वास्तव में बड़े घर की संतान कहलाने योग्य है।

सेमिनार में मेवाड़, मारवाड़, दक्षिण भारत और मुंबई सहित विभिन्न क्षेत्रों से आए श्रद्धालुओं ने सहभागिता की। कार्यक्रम के दौरान संतान के संस्कार निर्माण और परिवार में आध्यात्मिक मूल्यों की स्थापना को लेकर उपस्थित श्रद्धालुओं को प्रेरणादायी संदेश मिला।