धर्मसंघ को दो युगप्रधान गुरुओं का अवदान देने वाले थे पूज्य कालूगणी : महातपस्वी महाश्रमण

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लाडनूं : जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अखण्ड परिव्राजक, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने शनिवार को सुधर्मा सभा में आयोजित प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘दो गुरुओं के गुरु कालूगणी’ को विवेचित करते हुए कहा कि आज भाद्रव शुक्ला पूर्णिमा है। परम पूजनीय, परम वंदनीय आचार्यश्री कालूगणी का आचार्य पदारोहण दिवस है। आज 117 वर्ष उनके आचार्य पदारोहण को पूर्ण हो रहे हैं। आचार्यश्री भिक्षु स्वामी से हमारी आचार्य परंपरा चल रही है। आचार्य की महिमा का यशोगान आगमों में भी देखा जा सकता है। देवों के मध्य जैसे इन्द्र शोभायमान होते हैं, वैसे भिक्षुओं के मध्य आचार्य शोभायमान होते हैं। हमारे धर्मसंघ की दृष्टि से आचार्य सर्वोपरि स्थान पर होते हैं। सारे साधु-साध्वियां उन्हीं के शिष्य-शिष्याएं होते हैं। तेरापंथ धर्मसंघ में अलग-अलग शिष्य समूह की स्थिति नहीं है। साधु-साध्वियां कहां विहार-प्रवास करें, यह आचार्य का मौलिक अधिकार है। इसलिए यहां साधु-साध्वियों को अपने चतुर्मास के स्थान की चिंता भी नहीं रहती।
परम पूज्य आचार्यश्री कालूगणी तेरापंथ धर्मसंघ के अष्टम आचार्य बने। इसी लाडनूं में उन्होंने आचार्य पदारोहण किया। पूज्य डालगणी के सामने शारीरिक समस्या रही, उन्होंने लिखित निर्णय कर उसे प्रच्छन्न ही रखा। उन्होंने सभा में फरमा भी दिया कि मैंने अपने उत्तराधिकारी का निर्णय कर दिया है और हमारे साथ वाले 35 ठाणे में से ही कोई उत्तराधिकारी होगा। वे ऐसे करने वाले प्रथम आचार्य थे। मुनिश्री कालू (छापर) को आचार्यश्री मघवा के पास दीक्षा लेने का मौका मिला था। मघवागणी का सान्निध्य भी उन्हें बाल्यावस्था में मिला। उनके निर्देशन में उन्हें आगे बढ़ने का मौका मिला। पूज्य आचार्यश्री कालूगणीजी जब आचार्यश्री मघवागणी का वर्णन करते तो लगता मानों वे समक्ष विराजमान हों। वे अपनी पलेवणा भी आचार्यश्री मघवागणी के आसपास करते थे।
गुरु और शिष्य की बड़ी निकटता रहती थी। आचार्यश्री मघवागणी ने मुनि कालू (छापर) को व्याख्यान देना आदि भी सिखाया। संस्कृत भाषा के क्षेत्र में भी उनका विशेष विकास हुआ। आचार्यश्री कालूगणी के जीवन में तीन लोगों का विशेष प्रभाव रहा। आचार्यश्री मघवागणी का उनका विशेष प्रभाव रहा। मातुश्री छोंगाजी का भी उनके जीवन में अच्छा प्रभाव था। मुनि मगनलालजी का भी प्रभाव रहे।
आचार्यश्री ने आगे कहा कि मेरे जीवन में दो धर्मगुरु हुए- परम पूज्य गुरुदेव आचार्यश्री तुलसी और परम पूज्य आचार्यश्री महाप्रज्ञजी। आचार्यश्री कालूगणी इन दोनों धर्मगुरुओं के भी गुरु थे। हमको मानों ये दोनों गुरु कालूगणीप्रवर द्वारा ही मिले थे। ऐसे दो युगप्रधान आचार्यों का अवदान देने वाले दो गुरुओं के गुरु परम पूज्य कालूगणी थे। भाद्रव शुक्लपक्ष में ही वे आचार्य बने थे और भाद्रव शुक्लपक्ष में महाप्रयाण हुआ था। उनका आचार्यकाल लगभग सत्ताईस वर्षों का था। वे पुण्यवान आचार्य थे। आचार्यश्री ने इस दौरान आचार्यश्री कालूगणी की दीक्षा के सौ वर्ष पूर्णता के अवसर पर रचित गीत का भी संगान किया। हमारा धर्मसंघ ज्ञान, दर्शन व चारित्र में वृद्धि करता रहे। हमारा धर्मसंघ खूब अच्छा विकास करता रहे, इसके लिए परम पूज्य आचार्यश्री कालूगणी से भी प्रेरणा ले सकते हैं।
मंगल प्रवचन के उपरान्त मुमुक्षु लकित सेठिया ने आचार्यश्री के समक्ष अपनी भावना अभिव्यक्त की तो आचार्यश्री ने इस संदर्भ में कहा कि मुमुक्षु लकित को यथासंभवतया मृगशिर सूदी दूज, शुक्रवार 11 दिसम्बर 2026 को सुधर्मा सभा में मुनि दीक्षा देने का भाव है। आचार्यश्री की इस घोषणा से पूरा पण्डाल जयघोष से गुंजायमान हो उठा।
आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में अखिल भारतीय तेरापंथ युवक परिषद का 60वां वार्षिक अधिवेशन का शुभारम्भ हुआ। इस संदर्भ में अखिल भारतीय तेरापंथ युवक परिषद के अध्यक्ष श्री पवन माण्डोत ने अपनी अभिव्यक्ति देते हुए अपनी टीम के नवीन पदाधिकारियों को शपथ दिलाई। महामंत्री श्री सौरभ पटावरी ने भी अपनी अभिव्यक्ति दी। युवाचार्यश्री महावीरकुमारजी ने भी अधिवेशन के संभागियों को उद्बोधित किया।
आचार्यश्री ने अधिवेशन के संभागी युवाओं को मंगल पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि जो आदमी अपने जीवन में कार्यकर्ता के रूप में सेवा देना चाहता है, उसमें उत्साह और साहस भी होना चाहिए। किसी कार्य को निष्ठा तक पहुंचाने के लिए मानसिक उत्साह और मानसिक संकल्प के साथ कठिनाइयों को झेलने का साहस भी होना अपेक्षित होता है। इससे कार्यकर्ता को सफलता प्राप्त करने में सुविधा होती है। अखिल भारतीय तेरापंथ युवक परिषद का 60वां वार्षिक अधिवेशन हो रहा है। इसका अपना नेटवर्क है। यह तेरापंथ समाज की सेना के समान है। कहीं अपेक्षा हो सेवा और सहयोग की तो वहां युवकों को काम लिया जा सकता है। युवावाहिनी के युवक आते रहते हैं, इससे अच्छी प्रेरणा मिलती रह सकती है। अभातेयुप का एक समाचार पत्र का रूप तेरापंथ टाइम्स है। अभातेयुप का महत्त्वपूर्ण कार्य है किशोरों में अच्छे संस्कारों को तैयार करना। यह संस्था खूब अच्छा धार्मिक-आध्यात्मिक विकास करती रहे।
कार्यक्रम के दौरान अखिल भारतीय तेरापंथ युवक परिषद द्वारा वर्ष 2026 का ‘युवा गौरव’ अलंकरण श्री हितेश भाण्डिया को, ‘आचार्य महाप्रज्ञ प्रतिभा पुरस्कार’ श्री संजय सुराणा को प्रदान किया गया। ‘युवा गौरव’ अलंकरण के प्रशस्ति पत्र का वाचन निवर्तमान अध्यक्ष श्री रमेश डागा तथा ‘आचार्य महाप्रज्ञ प्रतिभा पुरस्कार’ के प्रशस्ति पत्र का वाचन उपाध्यक्ष द्वितीय श्री अभिनंदन नाहटा ने किया। अलंकरण और पुरस्कार प्राप्तकर्ताओं ने अपने कृतज्ञ भाव अभिव्यक्त किए। आचार्यश्री ने अलंकरण और पुरस्कारप्राप्तकर्ताओं को मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।