आत्मा ही है सच्चा मित्र और शत्रु : मुनिश्री तत्त्व रुचि ‘तरुण’ का प्रेरक संदेश


जयपुर : मानसरोवर के किरण पथ स्थित ‘महावीर भवन’ (श्री वर्धमान स्थानकवासी श्रावक संघ) में आयोजित एक आध्यात्मिक प्रवचन कार्यक्रम में संत मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ एवं मुनिश्री संभव कुमार जी के सान्निध्य में धर्म, साधना और आत्मचिंतन का गहन संदेश प्रवाहित हुआ।

कार्यक्रम के दौरान मुनिश्री तत्त्व रुचि ‘तरुण’ ने आर्ष वाणी का उल्लेख करते हुए कहा कि “स्वयं की आत्मा ही स्वयं की वास्तविक मित्र और शत्रु है।” उन्होंने समझाया कि सुप्रवृत्ति में रत आत्मा स्वयं की मित्र बनती है, जबकि दुष्प्रवृत्ति में लिप्त आत्मा ही अपने ही विनाश का कारण बनती है। उनके अनुसार जैन दर्शन यह स्पष्ट करता है कि वास्तविक मित्र और शत्रु बाह्य जगत में नहीं, बल्कि हमारे भीतर विद्यमान राग और द्वेष के भाव हैं।

उन्होंने कहा कि यदि व्यक्ति अपने भीतर के राग-द्वेष को शांत कर ले, तो बाहरी शत्रु का भाव स्वतः समाप्त हो जाता है। “भीतर की दृष्टि जब निर्मल होती है, तभी जीवन की दिशा भी शुद्ध होती है,” उन्होंने उपस्थित श्रद्धालुओं को आत्मशुद्धि और समता की साधना का संदेश दिया।

मुनिश्री संभव कुमार जी ने अपने प्रेरक भक्तिगीत के माध्यम से उपस्थित जनसमूह को आत्मनिरीक्षण की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति दूसरों पर आरोप लगाता है, वह वास्तव में अपने ही अंतर्मन का प्रतिबिंब प्रस्तुत करता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि दृष्टि जैसी होगी, वैसा ही संसार दिखाई देगा—सम्यक दृष्टि से ही सम्यक प्रवृत्ति और शुभ परिणाम संभव हैं।

इस अवसर पर स्थानकवासी संघ के प्रमुख ने बताया कि महावीर भवन में यह प्रथम अवसर था जब किसी तेरापंथी संत का प्रवचन आयोजित हुआ, जिससे श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह और आध्यात्मिक प्रसन्नता का वातावरण निर्मित हुआ।

कार्यक्रम का शुभारंभ तीर्थंकर विमल प्रभु की स्तुति से हुआ। संतों द्वारा उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं को प्रेक्षाध्यान का अभ्यास भी कराया गया। अंत में सामूहिक वंदना, आभार ज्ञापन एवं मंगल पाठ के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।

इससे पूर्व रविवार रात्रि को रजतपथ, मानसरोवर में मुनिश्री जी के सान्निध्य में एक आध्यात्मिक एवं प्रेरक अंत्याक्षरी कार्यक्रम भी आयोजित हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने सहभागिता कर भक्ति एवं ज्ञान की आनंदमय अनुभूति प्राप्त की।

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