जयपुर : अणुविभा केन्द्र, मालवीया नगर में सोमवार को “तनाव मुक्त जीवन शैली में कायोत्सर्ग की भूमिका” विषय पर विशेष आध्यात्मिक कार्यशाला आयोजित की गई। कार्यशाला में मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ महाराज का सान्निध्य प्राप्त हुआ।
मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ ने कहा कि बहिर्मुखी व्यक्ति तनावग्रस्त और अन्तर्मुखी व्यक्ति तनावमुक्त रहता है। तनाव आत्मा का स्वभाव नहीं, बल्कि विभाव है। इसलिए जो व्यक्ति आत्मा में रमण करता है, वह तनाव से मुक्त रहता है।
उन्होंने कहा कि तनाव आज वैश्विक समस्या बन चुका है। प्रतिस्पर्धा और निरंतर भागदौड़ के इस दौर में व्यक्ति मानसिक दबाव के साथ जीवन जी रहा है। ऐसे में कायोत्सर्ग तनाव मुक्ति का अमोघ उपाय है। शांति, समाधि और तनावमुक्त जीवनशैली के लिए कायोत्सर्ग की साधना अत्यंत प्रभावी है।
कार्यशाला को संबोधित करते हुए मुनिश्री संभव कुमार जी महाराज ने कहा कि कायोत्सर्ग केवल शारीरिक तनाव से ही नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक तनाव से भी मुक्ति प्रदान करता है। भगवान महावीर की साधना परंपरा में कायोत्सर्ग को आत्मशुद्धि का महत्वपूर्ण माध्यम बताया गया है। इसके माध्यम से व्यक्ति अतीत और वर्तमान की भूलों का प्रायश्चित कर स्वयं को विशुद्ध बनाने की दिशा में आगे बढ़ता है। उन्होंने कायोत्सर्ग को “गंगाजल के समान” बताते हुए कहा कि यह भीतर जमे विकारों और नकारात्मक भावों को धोने का माध्यम बनता है।
मुनिश्री ने कहा कि बाहर भ्रमण करने वाला तनावयुक्त और भीतर रमण करने वाला तनावमुक्त रहता है। साधु की प्रत्येक चर्या के अंत में कायोत्सर्ग करने का विधान है। नियमित कायोत्सर्ग से स्वास्थ्य बेहतर होता है, चिंतन शुद्ध एवं सकारात्मक बनता है और कार्यक्षमता का विकास होता है। इससे व्यक्ति भय और असुरक्षा की भावना से भी मुक्त होकर आत्मविश्वास के साथ जीवन जी सकता है।
इस अवसर पर तपस्विनी बहिन सुश्री भाविका जी छाजेड़, सुपौत्री श्री रमेश जी एवं तारा जी छाजेड़ तथा सुपुत्री श्री अनुज जी एवं बीना जी छाजेड़ ने अट्ठाई तप के अंतिम दिन का प्रत्याख्यान किया। उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं ने तपस्विनी की तपस्या की अनुमोदना की।
तपस्विनी के परिवार की ओर से श्रीमती डिम्पल जी छाजेड़ तथा श्री जैन श्वेताम्बर तेरापंथ सभा की ओर से श्री राजेन्द्र जी बांठिया ने विचार व्यक्त किए। समाज की ओर से साहित्य भेंट कर तपस्विनी बहिन का सम्मान किया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे।








