जयपुर : वर्तमान समय में विश्व के अनेक हिस्सों में युद्ध, तनाव और अशांति का वातावरण बना हुआ है। ऐसे दौर में संतों की भूमिका केवल आध्यात्मिक मार्गदर्शन तक सीमित नहीं, बल्कि समाज में शांति, सहिष्णुता और सद्भाव की स्थापना में भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसी उद्देश्य को केंद्र में रखते हुए मंगलवार को मालवीय नगर स्थित अणुविभा केन्द्र में ‘विश्व शांति में संतों की भूमिका’ विषय पर विशेष सेमिनार का आयोजन किया गया। कार्यक्रम मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ एवं मुनिश्री संभव कुमार जी के पावन सान्निध्य में संपन्न हुआ।
बड़ा वही, जिसका दिल बड़ा हो
सेमिनार को संबोधित करते हुए मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ ने कहा कि संत निज पर शासन और अनुशासन के सर्वोच्च प्रतीक होते हैं। त्याग, वैराग्य, संयम और सद्गुणों के प्रति समर्पण ही संत जीवन की पहचान है। उन्होंने भगवान महावीर के जीवन का स्मरण करते हुए कहा कि महावीर ने कठोर साधना के माध्यम से आत्मबोध और सिद्धि प्राप्त की तथा उनके उपदेश आज भी संपूर्ण मानवता के लिए शांति और कल्याण का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
व्यक्ति के वास्तविक बड़प्पन की व्याख्या करते हुए मुनिश्री ने कहा कि घर, परिवार और समाज में बड़ा वही है, जिसका दिल बड़ा है। संकीर्ण सोच व्यक्ति को कभी महान नहीं बना सकती। उदारता, विनम्रता और परहित की भावना ही व्यक्तित्व के वास्तविक उत्थान की पहचान हैं। उन्होंने कहा कि स्वार्थ, अहंकार, आलस्य, आवेश और अनावश्यक आग्रह व्यक्ति के छोटेपन को दर्शाते हैं, जबकि सहनशीलता, श्रमशीलता, व्यवहार-कुशलता, सामंजस्य और शांत वृत्ति व्यक्ति को सम्मान और प्रतिष्ठा प्रदान करते हैं।
शांत रहना ही शांति का महामंत्र
मुनिश्री संभव कुमार जी ने ‘संत गुणों की खान है’ गीत की भावपूर्ण प्रस्तुति से वातावरण को आध्यात्मिक और भक्तिमय बना दिया। धर्मसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि संत वही है, जो भीतर से शांत हो। विपरीत परिस्थितियों में भी शांत रहना और सहनशील बने रहना ही सच्ची संतता है। उन्होंने कहा कि समय आने पर प्रतिक्रिया देने के बजाय शांत रहना ही शांति का महामंत्र है।
विश्व में बढ़ते युद्ध और तनाव पर चिंता व्यक्त करते हुए मुनिश्री संभव कुमार जी ने कहा कि संत सदैव शांति के साधक रहे हैं और समाज को भी शांति का संदेश देते हैं। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में युद्ध, कलह और अशांति का एक प्रमुख कारण मनुष्य की असीमित इच्छाएं और अति महत्वाकांक्षा है। जब इच्छाएं संयम की सीमाओं को पार कर जाती हैं, तब संघर्ष और अशांति जन्म लेते हैं।
प्रेक्षाध्यान और जप अनुष्ठान से हुआ शुभारंभ
कार्यक्रम का शुभारंभ श्रावक-श्राविकाओं द्वारा तीर्थंकर प्रभु की स्तुति में प्रस्तुत भक्ति गीत से हुआ। इसके पश्चात आत्मशुद्धि, मानसिक एकाग्रता और आंतरिक शांति के लिए प्रेक्षाध्यान के विशेष प्रयोग तथा जप अनुष्ठान आयोजित किए गए। बड़ी संख्या में उपस्थित श्रद्धालुओं ने इन आध्यात्मिक उपक्रमों में सहभागिता कर धर्मलाभ प्राप्त किया।
सेमिनार का संदेश स्पष्ट रहा कि विश्व में स्थायी शांति की शुरुआत बाहरी परिस्थितियों को बदलने से नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर शांति, संयम, सहिष्णुता और संतोष के जागरण से होती है।








