दुर्गति का कारण है नशा : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण

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लाडनूं : अणुव्रत अनुशास्ता युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी के पावन सान्निध्य में अणुव्रत उद्बोधन सप्ताह के पांचवें दिन आज नशा मुक्ति दिवस का गरिमामय आयोजन संपन्न हुआ। इस अवसर पर बड़ी संख्या में विद्यार्थी एवं अभिभावक गण उपस्थित रहे, जिन्होंने आचार्यश्री से नशे से दूर रहने का संकल्प स्वीकार किया।

कार्यक्रम में मुनि नमिकुमारजी ने 44 दिन की तपस्या का प्रत्याख्यान किया। ज्ञातव्य है कि मुनिश्री ने अपनी दीक्षा के मात्र दस वर्षों में ही 45 की लड़ी की तपस्या पूर्ण करने का प्रयास किया है, जो अपने आप में विशेष उल्लेखनीय है।

धर्मसभा को संबोधित करते हुए युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने कहा कि मनुष्य जीवन का धागा बहुत ही संवेदनशील है, यदि एक बार टूट जाए तो फिर कोई गांठ लगाने जैसी स्थिति नहीं रहती। जब तक प्राण हैं, तब तक ही जीवन को साधा जा सकता है। वृद्धावस्था, व्याधि और इंद्रियों की क्षीणता जीवन की सक्षमता में सबसे बड़ी बाधाएं हैं, जो मनुष्य को परवश बना देती हैं। जैसे-जैसे उम्र ढलती है, रूप-लावण्य और कार्यक्षमता कम होने लगती है, जिससे स्वावलंबी जीवन जीना कठिन हो जाता है। अतः जब तक शरीर स्वस्थ है, तब तक धर्म और पुरुषार्थ का समाचरण कर लेना चाहिए, क्योंकि बुढ़ापे में लंबी यात्राएं और कठिन सेवा-कार्य करना असंभव सा हो जाता है। साधु जीवन में प्रमाद के लिए कोई स्थान नहीं है। साधु का समय स्वाध्याय, जप, ध्यान और परोपकार में व्यतीत होना चाहिए। जिस प्रकार दान से हाथ शोभित होते हैं, उसी प्रकार हाथ में आगम या ज्ञान के ग्रंथ होने से हाथों की शोभा बढ़ती है। यह दुर्लभ समय है जहाँ इतनी बड़ी संख्या में चारित्रात्माएं और मुमुक्षु एक साथ उपस्थित हैं। इस अवसर का लाभ उठाते हुए जीवन को अप्रमाद की स्थिति में पुष्ट करने का प्रयास करना चाहिए।

गुरुदेव ने आगे कहा कि नशा एक प्रकार का प्रमाद है, जो व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक और आर्थिक रूप से जड़ बना देता है। मदिरा या अन्य किसी भी प्रकार के नशे का सेवन करने वाला व्यक्ति अपनी सुध-बुध खो बैठता है और पापाचार में प्रवृत्त होकर दुर्गति का पात्र बनता है। यह एक घातक चक्र है, पहले व्यक्ति नशे का सेवन करता है, और फिर नशा व्यक्ति को अपने वश में कर लेता है। यह नशा न केवल आर्थिक हानि का कारण है, बल्कि परिवार और समाज के पतन का भी निमित्त बनता है। सरकार और धर्म का लक्ष्य जनहित है। आचार्यश्री तुलसी ने अणुव्रत के माध्यम से नशामुक्ति का भी कार्य किया। कितने लोगों ने हमारे धर्मसंघ के लोगों के द्वारा, चारित्रात्माओं के द्वारा प्रेरित होकर नशामुक्ति का संकल्प लिए होंगे। सद्भावना, नैतिकता, नशामुक्ति। इस संकल्पत्रय में भी नशामुक्ति की बात है। जैन-अजैन, यथायोग्य सभी नशामुक्ति की ओर ध्यान दे सकते हैं। अणुव्रत आंदोलन में कई लोग ऐसे भी हो सकते हैं, जिन्होंने बरसों पहले नियम लिया था और बरसों के बीतने के बाद भी उस नियम को पाल रहे हैं कि हमने उस समय नियम लिया था, वह आज भी पाल रहे हैं, शराब नहीं पीते हैं। जीवन में संयम रहे, प्रमाद न हो यह काम्य है।

इस अवसर पर लाडनूं अणुव्रत समिति के अध्यक्ष श्री शांतिलाल बैद, सुभाष बोस स्कूल के डायरेक्टर राम गोपाल मीर ने अपने विचार रखे।