आज मोबाइल फोन बच्चों की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। ऑनलाइन पढ़ाई से लेकर मनोरंजन तक, मोबाइल कई जरूरतें पूरी करता है। लेकिन जब जरूरत धीरे-धीरे आदत और फिर आदत से एडिक्शन में बदलने लगे, तो यह माता-पिता के लिए चिंता का विषय बन जाता है।
खाना खाते समय फोन, पढ़ाई के बीच फोन, खाली समय में फोन और सोने से ठीक पहले भी फोन—अगर बच्चे की दिनचर्या कुछ ऐसी हो गई है, तो समय रहते कदम उठाना जरूरी है।
बच्चे से मोबाइल छीन लेना इसका स्थायी समाधान नहीं है। जरूरत है कि माता-पिता घर में ऐसा माहौल बनाएं, जहां बच्चे को फोन के अलावा भी जिंदगी दिलचस्प लगे।
सबसे पहले माता-पिता अपना मोबाइल इस्तेमाल देखें
बच्चे वही सीखते हैं जो वे अपने आसपास देखते हैं। अगर माता-पिता हर समय मोबाइल में व्यस्त रहेंगे, तो बच्चे को फोन कम इस्तेमाल करने की सलाह बहुत प्रभावी नहीं होगी।
इसलिए शुरुआत बच्चे से नहीं, खुद से करें। परिवार में कुछ ऐसे समय तय किए जा सकते हैं, जब सभी लोग मोबाइल से दूर रहें।
फोन इस्तेमाल करने का समय तय करें
बच्चे को मोबाइल पूरी तरह देने या पूरी तरह छीन लेने के बजाय उसके इस्तेमाल का समय तय करना बेहतर तरीका हो सकता है।
उम्र और जरूरत के अनुसार स्क्रीन टाइम निर्धारित करें और बच्चे को पहले से बता दें कि फोन कितनी देर इस्तेमाल करना है। समय पूरा होने पर बिना बहस के फोन अलग रखने की आदत धीरे-धीरे विकसित की जा सकती है।
खाना खाते समय ‘नो फोन’ नियम
डाइनिंग टेबल को मोबाइल फ्री जोन बनाएं।
खाना खाते समय फोन की जगह परिवार के बीच बातचीत हो। बच्चे से उसके दिन के बारे में पूछें, उसकी पसंद-नापसंद जानें और उसे बातचीत का हिस्सा बनाएं।
कई बार बच्चे फोन इसलिए नहीं छोड़ते क्योंकि फोन उनका सबसे आसान साथी बन जाता है। बातचीत उस खाली जगह को भर सकती है।
सोने से पहले मोबाइल बिल्कुल नहीं
सोने से पहले मोबाइल का इस्तेमाल बच्चे की दिनचर्या को प्रभावित कर सकता है। इसलिए रात में सोने से पहले एक निश्चित समय के बाद सभी मोबाइल अलग रखने का नियम बनाया जा सकता है।
इसके बदले बच्चे के साथ कहानी पढ़ना, बातचीत करना या अगले दिन की तैयारी जैसी गतिविधियां अपनाई जा सकती हैं।
मोबाइल की जगह विकल्प दीजिए
सिर्फ यह कहना कि “फोन मत चलाओ” काफी नहीं है।
बच्चे को विकल्प चाहिए। किताबें, पेंटिंग, संगीत, खेल, साइकिलिंग, बोर्ड गेम्स, दोस्तों के साथ समय या परिवार के साथ छोटी-छोटी गतिविधियां—ये सभी मोबाइल के आकर्षण को कम कर सकते हैं।
बच्चे की रुचि पहचानकर उसे उसी दिशा में समय देना सबसे बेहतर तरीका हो सकता है।
हर खाली समय में फोन न दें
अक्सर बच्चा रोता है, खाना नहीं खाता या जिद करता है तो उसे शांत कराने के लिए तुरंत मोबाइल दे दिया जाता है। यही आदत धीरे-धीरे बच्चे को यह सिखा देती है कि परेशान होने पर फोन ही समाधान है।
माता-पिता को कोशिश करनी चाहिए कि हर भावनात्मक स्थिति का जवाब मोबाइल न बने।
बच्चे से बातचीत करें, आदेश नहीं
मोबाइल कम करने की वजह बच्चे को समझाना भी जरूरी है। केवल नियम थोपने के बजाय उससे बात करें कि फोन कितना और कब इस्तेमाल करना ठीक है।
जब बच्चा नियम बनाने की प्रक्रिया में शामिल होता है, तो उसके उन्हें स्वीकार करने की संभावना भी बढ़ती है।
एकदम से फोन बंद करने के बजाय धीरे-धीरे बदलाव
अगर बच्चा लंबे समय से मोबाइल का आदी है, तो अचानक फोन पूरी तरह बंद कर देना कई बार मुश्किल पैदा कर सकता है।
स्क्रीन टाइम को धीरे-धीरे कम किया जा सकता है। हर कुछ दिनों में थोड़ा समय कम करें और उसकी जगह कोई दूसरी गतिविधि जोड़ें। इस तरह बदलाव बच्चे के लिए ज्यादा सहज हो सकता है।
सबसे जरूरी—नियम पूरे परिवार के लिए हों
अगर बच्चे के लिए नियम है कि खाना खाते समय फोन नहीं चलेगा, तो माता-पिता को भी उसी नियम का पालन करना चाहिए।
बच्चे को यह महसूस नहीं होना चाहिए कि “मोबाइल चलाना बड़ों का अधिकार और बच्चों की गलती है।”
परिवार का सामूहिक अनुशासन ही सबसे मजबूत उदाहरण बनता है।
याद रखें, लक्ष्य मोबाइल छीनना नहीं है
आज के समय में मोबाइल और तकनीक से बच्चों को पूरी तरह अलग करना न तो संभव है और न ही जरूरी। असली लक्ष्य है बच्चे को मोबाइल का मालिक बनाना, मोबाइल का गुलाम नहीं।
माता-पिता अगर समय तय करें, खुद उदाहरण बनें, बच्चे को दूसरे विकल्प दें और उसके साथ पर्याप्त समय बिताएं, तो मोबाइल की बढ़ती निर्भरता को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
बच्चे को फोन से दूर करने की शुरुआत फोन छीनने से नहीं, उसके हाथ में जिंदगी के दूसरे खूबसूरत विकल्प देने से होती है।








