एक नहीं होते समस्या और दुःख : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण


लाडनूं : लाडनूं में स्थित जैन विश्व भारती परिसर में बने भव्य एवं विशाल सुधर्मा सभा में नित्य आयोजित होने वाले प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान देदीप्यमान महासूर्य, एकादशमाधिशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने बुधवार को निर्धारित विषय ‘समभाव से सहें वेदना’ को आगम के माध्यम से व्याख्यायित करते हुए कहा कि दो प्रकार वेदनाएं ज्ञात हैं। पहली वेदना है शारीरिक वेदना और दूसरा मानसिक वेदना। इस दुनिया में शारीरिक वेदना भी प्राणियों को होती है और संज्ञी प्राणियों को मानसिक वेदना भी हो सकती है। शरीर में पीड़ा हो जाए, किसी के पेट में दर्द हो रहा हो, किसी कमर में दर्द, किसी के घुटनों में दर्द, किसी के दांतों में दर्द हो सकते हैं। अनेक प्रकार की वेदनाएं प्राणियों को हो सकती है। कई बार वेदना को सहन करना भी कठिन हो सकता है। समता भाव से वेदनाओं को सहन बहुत कठिन भी हो सकता है।

कई बार शरीर में बीमारियां लग जाती हैं तो आदमी को कितनी बार डॉक्टर और अस्पताल के चक्कर लगाने पड़ते हैं। दवाईयां लेनी पड़ती हैं, दिन में कितनी बार दवाई खाना, इंजेक्शन, बीपी, शुगर, आदि की गोलियां लेना आदि-आदि के रूप में कितनी स्थितियां बनती हैं। कितनी बार अस्पताल में भर्ती कराना पड़ता होगा। ये कठिनाइयां अवस्था प्राप्त होने पर भी हो सकती हैं और कई बार असमय भी अनेक प्रकार की बीमारियां हो सकती हैं। ये भी बीमारियां और अनेक प्रकार के दर्द शरीर में ही होते हैं, ये सभी शारीरिक वेदनाएं हैं। अनंत प्रकार की ये शारीरिक वेदनाएं हो सकती हैं।

इसी प्रकार मन की पीड़ा भी हो सकती है। मानसिक वेदना को आधि भी कहा गया है। शारीरिक बीमारी को व्याधि और भावात्मक वेदना को उपाधि कहा गया है। आदमी को कई बार चिंता और भय हो जाता है। कई को मानसिक वेदना भी होती है। मन में जो कामनाएं पाल ली गईं हों और जरूरी नहीं कि सभी कामनाएं पूर्ण हो जाएं। जो कामनाएं पूर्ण नहीं होतीं तो फिर आदमी को मानसिक वेदना हो जाती है।

इस प्रकार आदमी को शारीरिक और मानसिक वेदना भी हो सकती है। आदमी के भीतर संतोष का भाव जाग जाए, अथवा कोई समता को अच्छा आलम्बन मिल जाए तो मानसिक वेदना से मुक्ति हो सकती है अथवा कमी भी आ सकती है। शारीरिक और मानसिक वेदनाओं में जितना संभव हो सके, शांति रखने का प्रयास करना चाहिए। जो भी स्थिति आ गई है, उसे कर्म निर्जरा का माध्यम मानकर सहन करने का प्रयास करना चाहिए।

बाहर की समस्या होने पर भी आदमी को मानसिक दुःख न हो। समस्या और दुःख एक नहीं होते। कोई समस्या दुःख को पैदा करने में निमित्त बन सकती है। आदमी में यह चिंतन आ जाए कि समस्या अलग है और मानसिक दुःख अलग है तो आदमी मानसिक रूप से मजबूत बन सकता है और समस्याओं का समाधान भी अच्छे ढंग से कर सकता है। इसलिए बाहर की समस्याओं के रहते हुए भी मानसिक शांति रह सकती है। समस्याओं का समाधान खोजने का प्रयास होता रहे, किन्तु मानस में शांति-समता बनी रहे। किसी भी स्थिति को सहन करने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को मानसिक वेदना से संत्रस्त होने से बचने का प्रयास करना चाहिए। आचार्यश्री भिक्षु के जीवन से भी समता-शांति की प्रेरणा ली जा सकती है।

मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने चारित्रात्मओं की जिज्ञासाओं के भी उत्तर प्रदान किए। आचार्यश्री से प्राप्त उत्तर न केवल चारित्रात्माओं को आत्मतोष प्रदान करने वाले होते हैं, बल्कि कितने-कितने श्रद्धालुओं को भी मानसिक शांति प्रदान करने वाले सिद्ध हो रहे हैं।

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