“हम मिट नहीं सकते” का भ्रम: आंकड़े और इतिहास क्या कहते हैं

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जयपुर :  1941 में जिस भू-भाग में हिंदू 14.6 प्रतिशत थे, जो आगे चलकर पश्चिमी पाकिस्तान बना, वहां आज उनकी आबादी दो प्रतिशत से भी कम रह गई है। INSIGHT UK की रिपोर्ट के ये आंकड़े सिर्फ आंकड़े नहीं हैं। ये एक समुदाय के सिमटते जाने की दास्तान हैं।

लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता आदित्य तिक्कू जी कहते हैं, “पाकिस्तान में हिंदुओं की घटती आबादी दुखद है, लेकिन मैं इससे हैरान नहीं हूं।” उनके अनुसार यह कोई अचानक घटी घटना नहीं, बल्कि इतिहास में बार-बार दोहराई गई कहानी का एक और अध्याय है।

80 साल में दो बार कटा देश

महज 80 वर्षों में भारतीय उपमहाद्वीप ने दो बड़े विभाजन देखे। 1947 में भारत कटकर पाकिस्तान बना। 1971 में पूर्वी पाकिस्तान अलग होकर बांग्लादेश बना। दोनों आज मुस्लिम-बहुल देश हैं। नक्शे के साथ आबादी, पहचान और सुरक्षा की तस्वीर भी बदल गई। तिक्कू जी का कहना है कि यह इतिहास भारत को अपनी राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक स्थिरता को लेकर हमेशा सतर्क रहने की याद दिलाता है।

“हम मिट नहीं सकते”: सबसे खतरनाक भ्रम

हिंदुओं में अक्सर यह धारणा रही है कि उनकी सभ्यता हजारों साल पुरानी है और वह कभी खत्म नहीं हो सकती। लेकिन इतिहास भरोसे की नहीं, सबूत की भाषा बोलता है। जिन इलाकों में कभी हिंदू बड़ी संख्या में थे, वहीं आज वे गिने-चुने रह गए हैं। यह कल्पना नहीं, आंकड़ों की सच्चाई है। जो समाज अपने संकटों से आंख मूंद लेता है, उसके लिए आत्मविश्वास कब अति-आत्मविश्वास और फिर भ्रम बन जाए, पता भी नहीं चलता।

अफगानिस्तान, ईरान, इंडोनेशिया: जहां बदल गई पहचान

अफगानिस्तान कभी बौद्ध धर्म और प्राचीन भारतीय संपर्कों का केंद्र था। बामियान के विशाल बुद्ध उसकी पहचान थे, जिन्हें 2001 में तालिबान ने नष्ट कर दिया। आज वहां हिंदू और सिख गिनती के रह गए हैं।

ईरान कभी पारसी धर्म और फारसी परंपराओं की भूमि था। सातवीं शताब्दी में अरब विजय के बाद वहां इस्लाम फैला, और आज पारसी वहां एक छोटा अल्पसंख्यक समुदाय हैं।

इंडोनेशिया में कभी मजापहित जैसे हिंदू साम्राज्य खड़े थे और बोरोबुदुर जैसे बौद्ध स्मारक बने। आज वही देश दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाला देश है।

तीनों कहानियां अलग हैं, लेकिन सबक एक है: किसी भी क्षेत्र की धार्मिक और सांस्कृतिक संरचना स्थायी नहीं होती।

भारत के भीतर भी उठ रहे हैं सवाल

तिक्कू जी पूछते हैं कि उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और राजस्थान सहित कई राज्यों में आबादी के स्वरूप में बदलाव, स्थानीय तनाव और पलायन पर गंभीर चर्चा क्यों नहीं होनी चाहिए। उनका कहना है कि अगर लोग असुरक्षा, हिंसा या सामाजिक दबाव के कारण अपना घर छोड़ने को मजबूर होते हैं, तो उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी है।

कश्मीर: जख्म जो आज भी हरे हैं

कश्मीरी पंडितों का पलायन इसका सबसे पीड़ादायक उदाहरण है। तिक्कू जी के अनुसार इस्लामिक आतंकवाद और असुरक्षा ने लोगों को अपने ही घरों से बेघर कर दिया। केंद्र सरकार की 2021 की जानकारी के मुताबिक घाटी छोड़ने वाले 44,167 पंजीकृत प्रवासी परिवारों में 39,782 हिंदू परिवार थे।

यूरोप भी अछूता नहीं: जब सड़कें जल उठीं

सामाजिक असंतोष किसी एक देश की समस्या नहीं है। अक्टूबर 2026 में फ्रांस में महंगाई और स्कूलों की बदहाली के खिलाफ निकले प्रदर्शन 17 अक्टूबर को भीषण हिंसा में बदल गए। पांच लाख से अधिक लोग सड़कों पर उतरे, और रात ढलते ही नकाबपोश भीड़ ने आगजनी और लूटपाट शुरू कर दी। लिमोज में 143 साल पुराने टाउन हॉल का मीनार जलकर ढह गया, लियों का पर्यटन कार्यालय फूंक दिया गया, और सरकार के अनुसार करीब 3,000 दुकानें लूटी गईं। एक पुलिसकर्मी और एक प्रदर्शनकारी की जान गई, और करीब 1,800 लोग गिरफ्तार हुए। जब विकसित यूरोप भी अपनी सामाजिक स्थिरता संभालने में लड़खड़ा जाता है, तो भारत को अपनी एकता के प्रति और कितना सजग रहना चाहिए?

सबक क्या है?

तिक्कू जी का कहना है कि धार्मिक स्वतंत्रता, सुरक्षा और अपनी सांस्कृतिक पहचान के साथ जीने का अधिकार किसी भी सभ्य समाज की बुनियाद है। उनका संदेश साफ है: पाकिस्तान में हिंदुओं की घटती आबादी पर चिंता जताने के साथ भारत में हो रहे सामाजिक बदलावों, पलायन और सांस्कृतिक विरासत के सवालों पर भी गंभीरता से सोचना होगा। इतिहास चेतावनी देता है, फैसला समाज को करना है। भारत को अतीत से सबक लेकर राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक पहचान और नागरिकों की सुरक्षा को सर्वोपरि रखना होगा।