जिज्ञासा से विषयों का होता है स्पष्टीकरण : शान्तिदूत आचार्यश्री महाश्रमण

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लाडनूं : जन-जन को अहिंसा नैतिकता व नशा मुक्ति की प्रेरणा प्रदान करने वाले जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशम अनुशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि आचार्यश्री महाश्रमणजी जैन विश्व भारती परिसर से नित्य प्रति आध्यात्मिक ज्ञान की गंगा प्रवाहित कर रहे हैं, जिसमें डुबकी लगाकर हजारों-हजारों श्रद्धालु अपने जीवन का कल्याण करने का प्रयास कर रहे हैं। शनिवार को सुधर्मा सभा में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को युगप्रधान अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आगम के माध्यम से पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि स्वाध्याय के पांच अंग हैं, उनमें वाचना पहला अंग है। जब वाचना दी जाती है, शिष्य-विद्यार्थी सामने उपस्थित होते हैं तो कई-कई विद्यार्थी प्रश्न करने वाले भी हो सकते हैं। प्रश्न करना एक अध्ययन-अध्यापन से जुड़ा हुआ तत्व है। प्रश्न हो सकता है कि प्रश्न करने से, प्रतिप्रश्न करने से क्या लाभ होता है?
उत्तर दिया गया कि प्रतिप्रच्छना से, प्रति-प्रश्न से सूत्र, अर्थ और उसके मूल तत्व विशुद्ध बन सकते हैं। जब शंका रहती है, संदेह रहता है, अस्पष्टता रहती है, तब विषय अशुद्ध रहता है यानी स्पष्ट नहीं होता है। यहां विशुद्धि का अर्थ स्पष्टता संभवतः काफी अनुकूल पड़ सकता है कि जो प्रश्न करेगा और उत्तर देने वाला भी योग्य उत्तर देगा, तो संदेह दूर हो जाता है, शंका समाप्त, विषय स्पष्ट हो जाता है।
प्रतिप्रच्छना से, प्रति-प्रश्न से सूत्र, अर्थ और उसके मूल तत्व विशुद्ध बन सकते हैं। जब शंका रहती है, संदेह रहता है, अस्पष्टता रहती है, तब विषय अशुद्ध रहता है यानी स्पष्ट नहीं होता है। यहां विशुद्धि का अर्थ स्पष्टता संभवतः काफी अनुकूल पड़ सकता है कि जो प्रश्न करेगा और उत्तर देने वाला भी योग्य उत्तर देगा, तो संदेह दूर हो जाता है, शंका समाप्त, विषय स्पष्ट हो जाता है।

जिज्ञासा को ज्ञान-जननी कहा गया है। जिज्ञासा ज्ञान को पैदा करने वाली होती है। जानने की इच्छा है, वह जिज्ञासा है।
जानने की इच्छा का परिणाम मानना चाहिए कि आदमी प्रश्न करता है, पूछता है और पूछता है इसका मतलब उसने कुछ विषय पर ध्यान दिया है, कुछ बात को ग्रहण किया है, तब उसके मन में और जिज्ञासा पैदा हुई होगी। कुछ सुना ही नहीं ध्यान से, ध्यान से पढ़ा ही नहीं, तब तो उस विषय की जिज्ञासा भी कितनी हो सकती है। जो विद्यार्थी ध्यान से पढ़ता है, जागरूकता से पढ़ता है, सुनता है, तो मन में जिज्ञासा भी पैदा हो सकती है। तो विद्यार्थी का मानो एक धर्म है जिज्ञासा करना, अपेक्षानुसार पूछना, जिज्ञासा करना। जब पूछा जाता है तो जो शिक्षक, गुरु या पढ़ाने वाले होते हैं, वे फिर उत्तर देते हैं तो स्पष्टीकरण हो जाता है।

इसी प्रकार कई बार कोई विषय समझ में नहीं आ रहा है, पर किसी ज्ञानी ने इतने विस्तार से स्पष्ट कर दिया, इतना अच्छी तरह बता दिया कि वह संदेह का कांटा होता है, वह निकल जाता है और विषय स्पष्ट हो जाता है। तो विशोधन हो जाता है यानी वे संदेह दूर हो जाते हैं।

इस प्रकार प्रतिप्रश्न करने से ज्ञान का विशोधन हो जाता है। आगम संबंधी बात है तो प्रश्न करने से स्पष्टता हो सकती है। प्रश्न करना तो आधी बात है, प्रश्न करने वाले ने कर लिया, उत्तरदाता उत्तर नहीं दे रहा है तो समाधान कैसे होगा? इसलिए जो विद्यार्थी हो, उसको पढ़ाई करना है, पढ़ाने वाला अध्यापक सामने है, तो जिज्ञासा औचित्य के अनुसार उठनी चाहिए।
उत्तर देने वाले को खुद को भी संतोष होना चाहिए कि मेरे पास सही उत्तर है। सटीक उत्तर दिया जाए तो उसका अच्छा परिणाम हो सकता है। प्रश्नकर्ता को भी अनाग्रही होना चाहिए। प्रश्नकर्ता भी योग्य हो और उत्तरदाता भी योग्य हो, तो सही अच्छा समाधान मिल सकता है। आगम के ज्ञाता, दार्शनिक, विद्वान जो हैं, उनसे उत्तम उत्तर की आशा की जा सकती है। मंगल प्रवचन के उपरांत आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं को उत्तरित किया।