लाडनूं : जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने शुक्रवार को सुधर्मा सभा में आयोजित प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘करण सत्य से क्या मिलेगा?’ को आगम के माध्यम से विवेचित करते हुए कहा कि उत्तरज्झयणाणि आगमें प्रश्न किया गया कि भंते! करण सत्य से जीव क्या प्राप्त करता है? बताया गया कि सत्य को तीन रूपों में अभिव्यक्त किया गया है- भाव सत्य, करण सत्य और योग सत्य। एक भाव का सत्य है, एक योग का सत्य है और एक करण का सत्य है। साधु के पांच आश्रवों का त्याग तीन करण, तीन योग से होता है। साधु का त्याग बहुत बड़ा होता है, क्योंकि साधुओं के त्याग जीवन भर के लिए होते हैं। अनशन, संथारा साधु भी करते हैं, गृहस्थ भी करते हैं। यह भी विशिष्ट बात होती है। संथारा जो बोलकर लिया जाए और पूर्ण जागरूकता में हो तो बहुत अच्छी बात होती है।
श्रावक सामायिक भी करता है तो उसमें दो करण तीन योग से छह कोटि की सामायिक होती है। इस कारण सामायिक भी तीन प्रकार की हो जाती है- छह कोटि, आठ कोटि और नौ कोटि। साधु का नौ कोटि की सामायिक होती है और वह जीवन भर के लिए होती है।
करण सत्य अर्थात् कार्य करने की सच्चाई। जो भी कार्य करना है, उसके प्रति निष्ठा की बात होती है। जो भी कार्य करना है, उसके प्रति तन्मय होकर कार्य करना चाहिए। काम दिया हुआ है और कोई कार्य करना नहीं चाहता, केवल समय काट रहा है तो वह कार्य के प्रति सच्चाई नहीं होती। कार्य को मन से करना और कार्य को अच्छे ढंग करना ही करण सत्य है। जो भी ड्यूटी हो, जिम्मेदारी हो उसे पूर्ण निष्ठा से करने का प्रयास करना चाहिए।
गृहस्थों की दृष्टि देखा जाए तो कार्य में ईमानदारी भी रखने का प्रयास करना चाहिए। आदमी में बेइमानी का भाव न हो, ऐसा प्रयास करना चाहिए। जो भी जिम्मेदारी मिली हो, उसे अच्छे ढंग से करने का प्रयास करना चाहिए। कार्य में पूरी प्रमाणिकता रखने का प्रयास करना चाहिए। जो आदमी अच्छे ढंग से कार्य करता है, उसमें कार्य शक्ति का विकास हो सकता है। उसकी कथनी और करनी में अंतर नहीं होता। गृहस्थ हो अथवा साधु, सभी को अपने कार्य के प्रति ईमानदारी रखने का प्रयास करना चाहिए। साधु को गोचरी करनी है तो मन से जाना चाहिए। गोचरी भी सम्यक् विधि से करने का प्रयास करना चाहिए। जिसे व्याख्यान देना है, उसे व्याख्यान की अच्छी तैयारी करके व्याख्यान देने का प्रयास करना चाहिए। कहीं सेवा की बात हो या ठिकाणे का कार्य हो, अच्छी ईमानदारी से करने का प्रयास करना चाहिए। इस प्रकार करण सत्य से कार्य शक्ति का विकास होता है। आदमी को अपनी इस शक्ति का विकास करने का प्रयास करना चाहिए।
मंगल प्रवचन के उपरान्त साध्वी संस्कृतिप्रभाजी ने आचार्यश्री की अनुज्ञा से अंग्रेजी भाषा में आज के प्रवचन के सारांश को अभिव्यक्त किया। एक और साध्वीजी ने आज के प्रवचन के संदर्भ में अंग्रेजी भाषा में अपने विचार व्यक्त किए।









