लाडनूं : तेरापंथ की राजधानी लाडनूं की धरा पर स्थित जैन विश्व भारती के सुरम्य परिसर में जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के दूसरे योगक्षेम वर्ष का महामंगल प्रवास कर रहे जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी की अमृतवाणी से नित्य ही हजारों श्रद्धालु लाभान्वित हो रहे हैं। न केवल श्रद्धालु, अपितु इस योगक्षेम वर्ष के दौरान अपने आराध्य के साथ प्रवास करने वाले 400 से अधिक चारित्रात्माएं इस महामंगल अवसर का सुन्दर लाभ उठा रही हैं।
रविवार को सुधर्मा सभा में आयोजित प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि प्रश्न किया गया कि क्षांति से जीव क्या प्राप्त करता है? दस प्रकार के धर्म बताए गए हैं, उनमें पहला उत्तम धर्म है-क्षांति अर्थात् क्षमा। दस श्रमण धर्म में पहला धर्म क्षांति है। जब साधु/साध्वी दीक्षा दी जाती है और रजोहरण प्रदान करते हुए मंगलकामना की जाती है कि क्षांति-मुक्ति में वर्धमान बने रहो। श्रमण की शोभा क्षांति से होती है। जैन शासन में तीर्थंकर से ऊपर कोई पद नहीं होता। उन्हें कभी गुस्सा आता ही नहीं। गुस्से पर जिसने विजय प्राप्त कर लेना क्षांति होती है। क्षांति से जीव परिषहों को जीत लेता है।
कोई गाली दे दे तो यह भी परिषह होते हैं। कोई बुरा व्यवहार भी कर दे तो साधु का धर्म होता है कि वह क्षांति में रहे। साधु को परम शांत होना चाहिए। साधु के भीतर क्रोध, गुस्सा आए ही नहीं, यह क्षांति की आराधना के द्वारा संभव हो सकता है। इसलिए साधु के जीवन में विशेष रूप से क्षांति धर्म का विकास होना चाहिए। किसी को तकलीफ में डालने की भावना भी कभी न आए। साधु विहार भी करते हैं। विहार के दौरान चलते समय सावधानी रखने का प्रयास करना चाहिए।
कोई समाज हो, संगठन हो, संस्था हो, चाहे वह धार्मिक हो, सामाजिक हो या राजनैतिक हो, जहां सहिष्णुता अच्छी होती है, उस संगठन और संस्था में शांति बनी रह सकती है। सहिष्णुता व्यक्ति की समाधि में भी सहायक बनती है। जो सहन करता है, वह पूज्य होता है। सहनशक्ति सभी में होनी चाहिए। खाने में ऊनोदरी रखने अर्थात् कम रख लेने से स्वास्थ्य अच्छा रहता है। क्षमा का भाव होता है, शांति रह सकती है। विनयशीलता रहे तो प्रशस्त भी रह सकता है। हालांकि कहां विनयशील होना, यह भी विवेकपूर्ण होना चाहिए। सहिष्णुता, विनयशीलता और विवेक रहे तो जीवन में क्षांति का विकास हो सकता है। इस प्रकार क्षांति के परिषहजयी बनने का प्रयास करना चाहिए।
मंगल प्रवचन के उपरान्त सघन साधना शिविर के शिविरार्थियों को युवाचार्यश्री महावीरकुमारजी ने मंगल प्रेरणा प्रदान की। आचार्यश्री ने भी शिविरार्थियों को विशेष रूप से मंगल प्रेरणा प्रदान की। श्री गौतमचंद डोसी ने अपनी अभिव्यक्ति दी। ज्ञानशाला बेंगलुरु, जैन विद्या से जुड़े विद्यार्थियों ने अपनी-अपनी प्रस्तुति दी। आचार्यश्री ने सभी को मंगल आशीर्वाद प्रदान करते हुए मंगल प्रेरणा भी प्रदान की।









