क्षमा करने से मिलती है सच्ची प्रसन्नता : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण

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लाडनूं : जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी का पावन चातुर्मास आध्यात्मिक नगरी लाडनूं स्थित जैन विश्व भारती परिसर में साधना-आराधना के साथ गतिमान है। गुरुदेव के सान्निध्य में उपासना-ध्यान में लीन हजारों श्रद्धालु प्रतिदिन सुधर्मा सभा में उपस्थित होकर आचार्य प्रवर की अमृतवाणी और मंगल देशना का श्रवण कर आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त कर रहे हैं। योगक्षेम वर्ष के अंतर्गत चलने वाले विशेष आध्यात्मिक उपक्रमों का भी सुचारू व समुचित संचालन हो रहा है, जिसमें साधु-साध्वी समुदाय के साथ-साथ संपूर्ण श्रावक समाज पूरी निष्ठा और उत्साह के साथ ज्ञानार्जन कर लाभान्वित हो रहा है। इसी क्रम में आज सुधर्मा सभा में आयोजित मुख्य प्रवचन कार्यक्रम के दौरान पूज्यप्रवर ने पर्युषण महापर्व एवं क्षमा धर्म के आध्यात्मिक महत्व पर पाथेय प्रदान किया।
आज के इस मंगल अवसर पर युवाचार्य श्री महावीर कुमार जी के युवाचार्य पद नियुक्ति की एक माह पूर्णता पर आचार्यप्रवर ने अपने उत्तराधिकारी को पावन शुभाशीष प्रदान किया। युवाचार्य श्री महावीर कुमार जी ने भी आत्मोद्गार व्यक्त किए।

मंगल देशना में “क्षमा से क्या मिलेगा?” विषय को व्याख्यायित करते हुए आचार्य प्रवर ने फरमाया कि क्षमा एक उत्तम धर्म है। जीवन में दूसरे ने कोई नुकसान किया हो, अपशब्द या गाली दे दी हो, निंदा-आलोचना कर दी हो, तो उसे सहन करना चाहिए, गुस्सा या उत्तेजना नहीं लानी चाहिए। निंदा-आलोचना का जवाब जबान से देने की बजाय अपने अच्छे कार्यों से देना चाहिए; गति और दिशा ठीक हो तो आज निंदा करने वाला कल प्रशंसा भी कर सकता है। यदि खुद से कोई भूल हुई हो तो मन में सच्चा अनुताप व पश्चात्ताप होना चाहिए। पूज्यप्रवर ने दृष्टांत देते हुए समझाया कि जहां सूखी मिट्टी का मैदान होता है, वहां चिंगारी गिरकर स्वतः शांत हो जाती है, उसी प्रकार यदि हम शांत रहें तो सामने बोलने वाला भी स्वतः शांत हो जाएगा। मार सकने और बोल सकने की पूरी शक्ति व सक्षमता होने के बावजूद शांत रहना ही सच्चा बड़प्पन है। चाहे साधु-साध्वी हों या गृहस्थ, बड़ों और माता-पिता के प्रति यथोचित विनय, सहिष्णुता और अनुशासन रखना चाहिए। परिवारों में संपत्ति आदि के मामलों को कोर्ट-कचहरी ले जाने के बजाय घर में ही प्रेम, नैतिकता और समझदारी से सुलझा लेना चाहिए।

आचार्यश्री ने क्षमा के आध्यात्मिक फल की विस्तृत व्याख्या करते हुए फरमाया कि क्षमा और खमतखामणा करने से चित्त में प्रह्लाद भाव यानी सच्ची प्रसन्नता पैदा होती है और मन का सारा बैर-विरोध समाप्त हो जाता है। जब जीव प्रह्लाद भाव को प्राप्त कर लेता है, तब वह संसार के समस्त प्राण, भूत, जीव और सत्त्व, सभी प्राणियों के प्रति अंतःकरण से मैत्री भाव उत्पन्न कर लेता है। सर्व-मैत्री के भाव से जीव की भाव-विशुद्धि हो जाती है और भाव-विशुद्धि होने पर आत्मा निर्भय यानी अभय पद को प्राप्त कर लेती है। इस प्रकार क्षमा से क्रमशः चार बड़ी उपलब्धियां मिलती हैं – प्रसन्नता, सर्व-मैत्री, भाव-विशुद्धि और निर्भयता। साधक के जीवन में अभय का बहुत बड़ा महत्व है। अतः पर्युषण पर्व के इन दिनों में सामायिक, स्वाध्याय, ध्यान, मौन और तप-जप में अधिक से अधिक समय बिताते हुए क्षमा धर्म की साधना को पुष्ट करना चाहिए।

कार्यक्रम में शासन गौरव साध्वीश्री राजीमती जी ने भावाभिव्यक्ति दी। युवाचार्य प्रवर के संसारपक्षीय पिताजी श्री सवाईचंद जी कोचर ने भी अपने विचार रखे।