डेस्क : अमेरिका में भारतीयों और दक्षिण एशियाई समुदायों के खिलाफ सोशल मीडिया पर बढ़ती नफरत को लेकर भारतीय मूल के अमेरिकी सांसद राजा कृष्णमूर्ति ने गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने आरोप लगाया कि बड़ी टेक कंपनियां नफरत फैलाने वाली सामग्री से मुनाफा कमा रही हैं, जबकि ऐसी सामग्री पर प्रभावी नियंत्रण लगाने में विफल साबित हो रही हैं।
कृष्णमूर्ति के मुताबिक, सोशल मीडिया पर नस्लीय और जातीय नफरत का बढ़ना केवल ऑनलाइन दुर्व्यवहार तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे वास्तविक जीवन में हिंसा का खतरा भी बढ़ रहा है। उन्होंने टेक कंपनियों से अपनी जिम्मेदारी निभाने और नफरत फैलाने वाली पोस्ट के खिलाफ सख्त कदम उठाने की मांग की है।
नफरत भरी पोस्ट में 240 प्रतिशत की वृद्धि
अमेरिका में दक्षिण एशियाई समुदाय के खिलाफ ऑनलाइन नफरत को लेकर सितंबर 2026 में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर जनवरी 2024 से जून 2026 के बीच ऐसी नफरत भरी पोस्ट की मासिक संख्या में लगभग 240 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। रिपोर्ट में जनवरी 2025 से जून 2026 के दौरान दक्षिण एशियाई समुदाय को निशाना बनाने वाली 5.42 लाख से अधिक नफरतपूर्ण पोस्ट की पहचान की गई।
रिपोर्ट में कहा गया कि इन पोस्ट में दक्षिण एशियाई लोगों को अमेरिका के लिए खतरा बताने, नौकरियां छीनने का आरोप लगाने और उनके खिलाफ नस्लीय पूर्वाग्रह फैलाने जैसी प्रवृत्तियां प्रमुख रहीं। विशेषज्ञों ने इसके पीछे आव्रजन को लेकर राजनीतिक बहस, आर्थिक असुरक्षा और सोशल मीडिया पर भड़काऊ सामग्री के प्रसार को प्रमुख कारणों में शामिल किया है।
मंदिर पर हमले की कथित साजिश ने बढ़ाई चिंता
अमेरिका के इलिनॉय राज्य के ऑरोरा स्थित श्री वेंकटेश्वर स्वामी (बालाजी) हिंदू मंदिर में 11 अक्टूबर को हुई कथित सामूहिक गोलीबारी की साजिश ने इस मुद्दे को और गंभीर बना दिया है। अधिकारियों के अनुसार, इस मामले में 19 वर्षीय एक युवक को गिरफ्तार किया गया है। आरोप है कि उसने मंदिर को निशाना बनाने की योजना बनाई थी, लेकिन उसकी राइफल जाम हो जाने के कारण वह कथित तौर पर अपने इरादे में सफल नहीं हो सका।
घटना के समय कृष्णमूर्ति अपने परिवार के साथ मंदिर में मौजूद थे। उन्होंने इस मामले की संभावित घृणा अपराध के रूप में संघीय जांच कराने की मांग भी की है। हालांकि, मामले में लगाए गए आरोपों की न्यायिक प्रक्रिया के तहत जांच की जानी है।
टेक कंपनियों की जवाबदेही तय करने की मांग
कृष्णमूर्ति ने सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही तय करने पर जोर देते हुए कहा है कि केवल कंपनियों के स्वैच्छिक प्रयासों के भरोसे ऑनलाइन नफरत पर अंकुश नहीं लगाया जा सकता। उनका तर्क है कि भड़काऊ और नफरतपूर्ण सामग्री को अधिक प्रसार मिलने से प्लेटफॉर्म को आर्थिक लाभ हो सकता है, जिससे ऐसी सामग्री पर प्रभावी नियंत्रण की आवश्यकता और बढ़ जाती है।
उन्होंने अमेरिकी कानून के उस प्रावधान में सुधार की जरूरत भी उठाई है, जो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उपयोगकर्ताओं द्वारा पोस्ट की गई सामग्री के लिए कंपनियों को व्यापक कानूनी संरक्षण प्रदान करता है। इस प्रावधान को कम्युनिकेशंस डिसेंसी एक्ट की धारा 230 के नाम से जाना जाता है।
नस्लीय नफरत पर सख्त कार्रवाई की जरूरत
अमेरिका में भारतीय मूल के लोगों की बढ़ती सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक भागीदारी के बीच उनके खिलाफ नस्लीय टिप्पणियों और ऑनलाइन उत्पीड़न की घटनाएं चिंता का विषय बन रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि सोशल मीडिया पर फैलने वाली नफरत को नजरअंदाज करने से उसका असर समाज में भी दिखाई दे सकता है।
कृष्णमूर्ति का कहना है कि भारतीयों और अन्य दक्षिण एशियाई समुदायों को निशाना बनाने वाली नफरत के खिलाफ सरकार, कानून प्रवर्तन एजेंसियों और टेक कंपनियों को मिलकर काम करना चाहिए। उनके अनुसार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ-साथ लोगों की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करना भी जरूरी है।
अमेरिका में यह बहस अब केवल सोशल मीडिया की निगरानी तक सीमित नहीं रह गई है। ऑनलाइन नफरत, नस्लीय भेदभाव और कथित हिंसक साजिशों के बीच संबंधों को लेकर बढ़ती चिंता ने टेक कंपनियों की जिम्मेदारी और सरकार की भूमिका पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।









