निर्जरा का साधन है वैयावृत्य : महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमण

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लाडनूं : जन-जन के मानस को आध्यात्मिक अभिसिंचन प्रदान करने वाले, सद्भावना, नैतिकता व नशामुक्ति की अलख जगाने वाले जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी की पावन सन्निधि में प्रतिदिन हजारों की संख्या में श्रद्धालु आध्यात्मिक ऊर्जा को प्राप्त कर रहे हैं। तेरापंथ धर्मसंघ के दूसरे योगक्षेम वर्ष के भव्य आयोजन का सुअवसर तो मानों लाडनूंवासियों के लिए संजीवनी जैसा कार्य कर रही है। अपने आराध्य से 400 से भी अधिक चारित्रात्माओं के निकट दर्शन, सेवा व उपासना का अवसर वर्षों की पुण्याई के अर्जन का माध्यम बनी हुई है। तभी तो जैन विश्व भारती का विशाल परिसर भी श्रद्धालुओं की उपस्थिति के कारण जनाकीर्ण-सा बना दिखाई देता है। युगप्रधान अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी भी अपने श्रद्धालुओं पर महति कृपा बरसाते हुए नित्य प्रति आगमों के माध्यम से कल्याणकारी मंगल पाथेय प्रदान करते हैं, जिससे न जाने कितने-कितने श्रद्धालु लाभान्वित हो रहे हैं। जैन विश्व भारती के सुरम्य परिसर में बने विशाल सुधर्मा सभा में आयोजित होने वाले प्रातःकालीन मंगल प्रवचन कार्यक्रम में आचार्यश्री के पावन पदार्पण से पूर्व ही चतुर्विध धर्मसंघ बड़ी संख्या में उपस्थित हो जाता है, जो अपने आराध्य की अमृतवाणी का रसपान कर ही अपने जीवन के अन्य कार्यों से जुड़ता है।
गुरुवार को सुधर्मा सभा में आयोजित प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को सर्वप्रथम युगप्रधान अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी ने नवरात्र के संदर्भ में आध्यात्मिक अनुष्ठान के लिए निर्धारित मंत्रों के जप का प्रयोग कराया। तदुपरान्त महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘वैयावृत्य से क्या मिलेगा?’ को आगम के माध्यम से प्रतिपादित करते हुए कहा कि प्रश्न किया गया कि भंते! वैयावृत्य से जीव क्या प्राप्त करता है? तप के बारह भेद बताए गए हैं, जिनमें छह बाह्य तप और छह आभ्यंतर तप होता है। आभ्यंतर तप के छह प्रकारों में से एक है-वैयावृत्य। निर्जरा का एक साधन है वैयावृत्य अर्थात् सेवा।
सेवा एक ऐसा तत्त्व है, जिसकी उपयोगिता साधु के जीवन में, गृहस्थ के जीवन में और तो क्या पशु जगत में भी किसी रूप में देखने को मिल सकती है। कई मनुष्य पशु की चिकित्सा भी करते हैं। सेवा साधु समाज में भी उपयोगितापूर्ण है। एक साधु दूसरे साधु अथवा चारित्रात्मा की सेवा करे। जो साधु सेवासापेक्ष हों, सेवाग्राही हों अथवा जो सेवा के अधिकारी हों, उनकी सेवा करनी होती है। आचार्य की सेवा करना भी वैयावृत्य होती है। युवाचार्य की भी सेवा होती है। युवाचार्य भी आचार्य का प्राथमिक स्वरूप ही होता है तो उनकी सेवा भी करनी होती है। युवाचार्य दो अवस्थाओं में बनाए जा सकते हैं। उनमें पहले तो यह है कि जब आचार्य की ऐसी अवस्था लगे कि अब बहुत कम समय बचा है, कार्य करने में बहुत अक्षम महसूस करना तो वैसी स्थिति में युवाचार्य बनाए जा सकते हैं। दूसरा है कि आचार्य की इच्छा हो जाए कि अब मुझे अपना युवाचार्य बना देना चाहिए। आचार्य भले स्वस्थ हों, शारीरिक सक्षमता भी ठीक हो तो भी वे चाहें तो अपना युवाचार्य बना सकते हैं। आचार्यश्री तुलसी स्वस्थ थे, शरीर से भी कोई अक्षमता प्रतीत नहीं हो रही थी, लेकिन उन्होंने अपना युवाचार्य मुनिश्री नथमलजी स्वामी (टमकोर) को बनाया। युवाचार्य का भी अपना दायित्व हो जाता है। यदि आचार्य अक्षम हों तो उनकी शारीरिक सेवा करने का ध्यान देना होता है। संघीय व्यवस्थाओं पर भी युवाचार्यजी को ध्यान देना होता है। आचार्यश्री तुलसी को जब युवाचार्य बनाया गया, तब वर्तमान अनुशास्ता अस्वस्थ हो गए थे, तब मुनि तुलसी को युवाचार्य बनाया गया था।
इस प्रकार आचार्य हों, युवाचार्य हों, कोई रुग्ण हो, वृद्ध हों अथवा कोई बाल साधु-साध्वी हों तो वह सेवा सापेक्ष होते हैं, उनकी अग्लान भाव से सेवा करने का प्रयास करना चाहिए। सेवा लेने वाला कभी कुपित भी हो जाए, किन्तु सेवा करने वाले को गुस्सा नहीं करना चाहिए। बहुत ही अहोभाव से सेवा का प्रयास करना चाहिए। कुछ कठोर सुनने के बाद भी समता में रहना, सहना और सेवा देना बहुत अच्छी बात होती है। विनयवान बनने का प्रयास करना चाहिए। सेवा लेने और देने वाले दोनों में कला हो तो कार्य बहुत अच्छा हो सकता है। सेवा देना भी निर्जरा का कार्य है तो इससे तीर्थंकर नाम गोत्र के बंधन का कारण बन सकता है।
मंगल प्रवचन के उपरान्त साध्वी प्रतिभाश्रीजी ने आचार्यश्री से 31 दिन की तपस्या का प्रत्याख्यान किया। तदुपरान्त सघन साधना शिविर के शिविरार्थियों ने आचार्यश्री के समक्ष अपनी-अपनी जिज्ञासाएं प्रस्तुत कीं तो आचार्यश्री ने उन्हें उत्तरित किया।