लाडनूं : जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, अखण्ड परिव्राजक, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में नवरात्र के संदर्भ में आध्यात्मिक अनुष्ठान का क्रम भी निरंतर जारी है। प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में अपने प्रवचन से पूर्व आचार्यश्री चतुर्विध धर्मसंघ को निधारित मंत्रों के जप का प्रयोग कराते हैं। मंत्रों की गूंज से मानों पूरे वातावरण में नवीन ऊर्जा संचालित हो जा रही है।
नित्य की भांति बुधवार को भी सुधर्मा सभा में आयोजित प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम के दौरान उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आज के निर्धारित विषय ‘प्रतिरूपता से क्या मिलेगा?’ को आगम के माध्यम से व्याख्यायित करते हुए कहा कि आगम में बताया गया कि जिनकल्पित जैसे आचार का पालन करना प्रतिरूपता कहलाती है। प्रतिरूपता एक अर्थ यह भी होता है कि अधिक उपकरण नहीं करना, अधिक उपकरणों का त्याग करना। अल्प उपकरण अथवा अचेल रहना यह प्रतिरूपता होती है। प्रतिरूपता से जीव हल्केपन को प्राप्त हो जाता है। जिसके कपड़े नहीं होते, वह कितना हल्का हो जाता है। कपड़ों का भी तो भार होता है, लेकिन कपड़ा हो ही नहीं, तो हव कितना हल्का हो सकता है।
प्रतिरूपता के लिए आदमी को लघुता को प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। अल्प उपकरण से भी आदमी कितना हल्का हो जाता है। बाह्य रूपों में भी लघुता हो सकती है और आंतरिक रूपों से भी लघुता हो सकती है। कपड़े आदि अन्य उपकरण अल्प रखना अथवा नहीं रखना बाह्य लघुता का रूप है तो कषाय से मुक्त रहना, राग-द्वेष की भावना का त्याग कर समता, शांति में रहना आंतरिक लघुता होती है। कम कपड़े रखना, उपकरणों का अधिक संग्रह नहीं करने वाला साधु विहार के दौरान भी स्वयं को कितना हल्का महसूस कर सकता है। सीमित उपकरणों का उपयोग करना भी अच्छी बात हो सकती है। जितना आवश्यक हो उतने उपकरण तो रखा जा सकता है, लेकिन अनावश्यक संग्रह से बचने का प्रयास करना चाहिए। उपकरणों की अल्पता के प्रति जागरूक रहने का प्रयास करना चाहिए। आवेश से मुक्त रहना भी प्रतिरूपता एक रूप हो सकता है। क्षमा की भावना का भी विकास करने का प्रयास करना चाहिए।
मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने सघन साधना शिविर के शिविरार्थियों को अपनी जिज्ञासाओं को प्रस्तुत करने का अवसर प्रदान किया। शिविरार्थियों ने अपनी-अपनी जिज्ञासाएं आचार्यश्री के समक्ष रखे तो आचार्यश्री ने उनकी जिज्ञासाओं के उत्तर प्रदान किए।








