डेस्क : दिल्ली हाईकोर्ट ने बुजुर्ग महिलाओं के घरेलू योगदान और उनके भावनात्मक सहयोग को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा है कि उम्र बढ़ने का मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति परिवार के लिए योगदान देना बंद कर देता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि घर में बिना वेतन किए जाने वाले काम, बच्चों और पोते-पोतियों की देखभाल तथा परिवार को भावनात्मक सहारा देने जैसी सेवाओं का भी आर्थिक महत्व है।
जस्टिस अनीश दयाल की पीठ ने सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हुई बुजुर्ग महिला गंगा देवी के मामले में मुआवजे की राशि बढ़ाने का आदेश दिया। अदालत ने पहले से निर्धारित मुआवजे में 6,37,307 रुपये की वृद्धि करते हुए कुल मुआवजा 20,79,307 रुपये कर दिया। इस राशि पर दावा याचिका दाखिल करने की तारीख से 7.5 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देय होगा।
उम्र के आधार पर घरेलू योगदान को नजरअंदाज नहीं कर सकते
हाईकोर्ट ने कहा कि किसी बुजुर्ग महिला के योगदान का आकलन इस धारणा के आधार पर नहीं किया जा सकता कि अधिक उम्र होने के कारण वह परिवार के लिए उपयोगी नहीं रह गई है। घरेलू कामकाज और परिवार के सदस्यों की देखभाल भले ही वेतन के बदले न की जाती हो, लेकिन इन सेवाओं का वास्तविक महत्व होता है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि घरेलू काम के लिए अलग से वेतन नहीं मिलने का लाभ दुर्घटना के लिए जिम्मेदार पक्ष को नहीं दिया जा सकता। मुआवजे का निर्धारण करते समय पीड़ित की उम्र के साथ-साथ उसकी वास्तविक भूमिका, चोटों के प्रभाव और भविष्य में काम करने की क्षमता पर भी विचार करना जरूरी है।
पहले 14.42 लाख रुपये मिला था मुआवजा
मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण ने गंगा देवी को पहले 14.42 लाख रुपये का मुआवजा दिया था। हालांकि, दिल्ली हाईकोर्ट ने मामले पर दोबारा विचार करते हुए पाया कि दुर्घटना के बाद महिला को होने वाली परेशानी, घरेलू कार्य करने की क्षमता में कमी और देखभाल की आवश्यकता को पर्याप्त महत्व दिया जाना चाहिए।
अदालत ने मुआवजे में 6.37 लाख रुपये से अधिक की बढ़ोतरी की, जिससे कुल राशि लगभग 20.79 लाख रुपये हो गई।
बस हादसे में गंवाने पड़े थे पैर
गंगा देवी वर्ष 2019 में दिल्ली के पांडव नगर इलाके में बस दुर्घटना का शिकार हुई थीं। हादसे में उनके दोनों पैर गंभीर रूप से कुचल गए थे। उनका बायां पैर घुटने के नीचे से काटना पड़ा, जबकि दाएं पैर की सभी उंगलियां भी गंवानी पड़ीं। दुर्घटना के कारण उन्हें 74 प्रतिशत स्थायी शारीरिक दिव्यांगता हुई।
अदालत ने मुआवजे का निर्धारण करते समय उनकी चोटों की गंभीरता, दैनिक गतिविधियों पर पड़े प्रभाव और भविष्य में आवश्यक सहायता को ध्यान में रखा।
देखभाल और कृत्रिम पैर के खर्च को भी मिली अहमियत
हाईकोर्ट ने बुजुर्ग महिला की देखभाल के लिए मिलने वाली राशि को 50 हजार रुपये से बढ़ाकर 5 लाख रुपये कर दिया। अदालत ने कहा कि परिवार के सदस्य यदि बिना भुगतान के किसी घायल व्यक्ति की देखभाल करते हैं, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि उस सहायता का कोई मूल्य नहीं है।
इसके अलावा, दर्द और पीड़ा के लिए मुआवजा 75 हजार रुपये से बढ़ाकर 1 लाख रुपये किया गया। महिला के लिए एक और कृत्रिम पैर खरीदने के वास्ते 1.30 लाख रुपये और उसके रखरखाव के लिए 75 हजार रुपये देने का भी निर्देश दिया गया।
बुजुर्गों के अधिकारों के लिहाज से महत्वपूर्ण फैसला
दिल्ली हाईकोर्ट का यह फैसला उन बुजुर्गों और गृहिणियों के लिए महत्वपूर्ण है, जिनके घरेलू योगदान को अक्सर इसलिए कम आंका जाता है क्योंकि वे प्रत्यक्ष रूप से आय अर्जित नहीं करते।
अदालत की टिप्पणी का संदेश स्पष्ट है कि परिवार की देखभाल, घरेलू जिम्मेदारियां निभाना और भावनात्मक सहयोग देना भी मूल्यवान सेवाएं हैं। सड़क दुर्घटना जैसे मामलों में उचित मुआवजा तय करते समय इन योगदानों को केवल उम्र या वेतन के अभाव के आधार पर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।









