पाकिस्तान में 6 सितंबर को मनाया जाने वाला ‘डिफेंस डे’ देश की सैन्य शक्ति, 1965 के युद्ध और सशस्त्र बलों के सम्मान से जुड़ा महत्वपूर्ण अवसर है। लेकिन इस वर्ष पेरिस में इसी दिन आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सभा ने पाकिस्तान के आधिकारिक सैन्य आख्यान के समानांतर एक ऐसा पक्ष सामने रखा, जिसे नजरअंदाज करना आसान नहीं है।
पेरिस स्थित पाकिस्तान दूतावास के बाहर आयोजित इस सभा में 12 देशों के प्रतिनिधियों और प्रतिभागियों ने पाकिस्तान की सेना की भूमिका, मानवाधिकारों की स्थिति और क्षेत्रीय अस्थिरता से जुड़े गंभीर सवाल उठाए। कार्यक्रम का आयोजन निर्वासित पाकिस्तानी पत्रकार ताहा सिद्दीकी द्वारा स्थापित ‘डिसिडेंट क्लब’ ने किया था। सभा में पाकिस्तान, भारत, अफगानिस्तान, फ्रांस, कजाकिस्तान, स्विट्जरलैंड और अमेरिका समेत कई देशों के प्रतिभागियों ने अपने विचार रखे।
सभा का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह था कि वक्ताओं ने पाकिस्तान के सैन्य इतिहास को केवल युद्ध और सैन्य पराक्रम के नजरिये से देखने के बजाय उसके मानवीय और राजनीतिक प्रभावों पर चर्चा की। जबरन गुमशुदगी, सामूहिक दंड, राजनीतिक दमन और कथित प्रॉक्सी हिंसा जैसे मुद्दों को उठाते हुए वक्ताओं ने स्वतंत्र जांच की मांग की।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि सभा में लगाए गए सभी आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अलग-अलग स्तर पर आवश्यक है। किसी भी सरकार, सेना या संस्था के खिलाफ गंभीर आरोपों को केवल राजनीतिक मंच से उठाए जाने के आधार पर अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता। लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में आरोपों की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच का रास्ता भी बंद नहीं किया जा सकता।
पाकिस्तान के लिए चिंता का विषय केवल अंतरराष्ट्रीय आलोचना नहीं है। यदि उसके अपने नागरिक, पत्रकार, राजनीतिक कार्यकर्ता और सामाजिक संगठन लगातार सैन्य प्रतिष्ठान की भूमिका पर सवाल उठा रहे हैं, तो यह उसके लोकतांत्रिक संस्थानों की मजबूती का भी प्रश्न है। लोकतंत्र में सेना का सम्मान अपनी जगह है, लेकिन सेना को लोकतांत्रिक संस्थाओं और कानून से ऊपर रखना किसी भी देश के लिए दीर्घकालिक रूप से नुकसानदेह हो सकता है।
पेरिस की सभा में पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर और अफगानिस्तान की स्थिति को लेकर भी गंभीर दावे किए गए। आयोजकों ने सुरक्षा बलों की कार्रवाई में बड़ी संख्या में लोगों के मारे जाने के आरोप लगाए और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से स्वतंत्र जांच की अपील की। इन दावों की सत्यता का निर्धारण निष्पक्ष जांच और विश्वसनीय प्रमाणों के आधार पर ही होना चाहिए। फिर भी, इन आरोपों का अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठना यह बताता है कि पाकिस्तान की नीतियों और सैन्य प्रतिष्ठान की भूमिका को लेकर सवाल अब केवल घरेलू बहस तक सीमित नहीं हैं।
भारत के दृष्टिकोण से भी यह विषय महत्वपूर्ण है। जम्मू-कश्मीर में दशकों से चली आ रही हिंसा, सीमा पार आतंकवाद और सशस्त्र समूहों के कथित समर्थन ने क्षेत्र में गहरी मानवीय और राजनीतिक कीमत वसूली है। इसलिए पाकिस्तान की सैन्य नीतियों पर होने वाली अंतरराष्ट्रीय चर्चा का भारत में स्वाभाविक रूप से विशेष महत्व है। हालांकि, भारत को भी इस विषय पर अपनी स्थिति अंतरराष्ट्रीय कानून, प्रमाण और लोकतांत्रिक मूल्यों के आधार पर ही मजबूती से रखनी चाहिए।
अफगानिस्तान से जुड़े आरोप भी कम गंभीर नहीं हैं। पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच लंबे समय से सुरक्षा, आतंकवाद और सीमा विवाद को लेकर तनाव रहा है। यदि किसी देश की सुरक्षा नीति पड़ोसी देश की राजनीतिक स्थिरता और नागरिकों की सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है, तो उस पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
आज पाकिस्तान के सामने मूल चुनौती यह है कि वह सैन्य गौरव और राष्ट्रीय सुरक्षा की अवधारणा को मानवाधिकार, लोकतंत्र और जवाबदेही के साथ कैसे संतुलित करता है। राष्ट्रीय सुरक्षा का अर्थ केवल सीमाओं की रक्षा नहीं है; नागरिकों की स्वतंत्रता, कानून का शासन और राजनीतिक संस्थाओं की स्वायत्तता भी राष्ट्रीय सुरक्षा का ही हिस्सा हैं।
पेरिस में हुई सभा को पाकिस्तान के खिलाफ किसी एक पक्ष का राजनीतिक अभियान मानकर खारिज करना आसान हो सकता है। लेकिन ऐसे आयोजनों में उठाए गए सवालों को पूरी तरह नजरअंदाज करना भी समाधान नहीं है। यदि आरोप गलत हैं तो स्वतंत्र जांच उन्हें गलत साबित कर सकती है; और यदि उनमें सत्य का अंश है तो जवाबदेही ही लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करेगी।
पाकिस्तान का वास्तविक सैन्य सम्मान केवल परेड, नारों और युद्ध की स्मृतियों से नहीं, बल्कि इस बात से तय होगा कि उसकी संस्थाएं अपने नागरिकों के अधिकारों और कानून के शासन के प्रति कितनी जवाबदेह हैं। डिफेंस डे यदि वास्तव में राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रतीक है, तो उस दिन उठे मानवाधिकार और लोकतंत्र के सवालों पर भी उतनी ही गंभीरता से विचार होना चाहिए।
राष्ट्रीय शक्ति का सबसे मजबूत आधार केवल हथियार नहीं, बल्कि न्याय, लोकतंत्र और नागरिकों का विश्वास होता है।








