डेस्क : संयुक्त राष्ट्र में भारत ने मानवाधिकारों के मुद्दे पर चुनिंदा देशों की आलोचना किए जाने पर कड़ा ऐतराज जताया है। भारत ने स्पष्ट कहा कि मानवाधिकारों का इस्तेमाल किसी देश पर राजनीतिक दबाव बनाने या उसे चुनिंदा तौर पर निशाना बनाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। यह प्रतिक्रिया ऐसे समय आई है, जब संयुक्त राष्ट्र के कुछ विशेषज्ञों ने भारत में शांतिपूर्ण प्रदर्शनों पर कथित प्रतिबंधों, बल प्रयोग और कार्यकर्ताओं की हिरासत को लेकर चिंता जताई थी।
संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों ने अपने बयान में कहा था कि उन्होंने भारतीय अधिकारियों के समक्ष शांतिपूर्ण सभाओं पर कथित अनुचित प्रतिबंध, बल का अत्यधिक इस्तेमाल, मनमानी हिरासत, जबरन गुमशुदगी और छात्र कार्यकर्ताओं को निशाना बनाए जाने जैसे मुद्दे उठाए हैं। विशेषज्ञों ने अधिकारियों से बल प्रयोग रोकने, सभाओं पर व्यापक प्रतिबंध हटाने और डिजिटल निगरानी के कथित दुरुपयोग से बचने की अपील भी की थी।
भारत ने संवैधानिक प्रावधानों का दिया हवाला
मंगलवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत का पक्ष रखते हुए भारतीय राजनयिक बरखा ताम्रकार ने कहा कि भारतीय संविधान में मानवाधिकारों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त प्रावधान मौजूद हैं। उन्होंने विशेष रूप से संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लेख किया, जो जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा करता है। उन्होंने कहा कि देश में कानून के अनुसार प्रक्रिया का पालन सुनिश्चित करने के लिए संवैधानिक व्यवस्थाएं मौजूद हैं।
ताम्रकार ने कहा कि भारत दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में अपुष्ट आरोपों, अधूरे आंकड़ों और ऐसे दस्तावेजों के आधार पर नकारात्मक छवि प्रस्तुत करने के प्रयासों का विरोध करता है, जिनमें भारत से संबंधित विशिष्ट टिप्पणियां नहीं हैं। उन्होंने मानवाधिकारों के मामलों में निष्पक्षता, प्रमाणों और रचनात्मक संवाद के महत्व पर भी जोर दिया।
यूरोप के प्रदर्शनों पर रुख को लेकर उठे सवाल
भारत के इस रुख के बीच संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार प्रमुख वोल्कर तुर्क की यूरोप में हिंसक प्रदर्शनों पर प्रतिक्रिया की भी चर्चा हुई। तुर्क ने हिंसा और सार्वजनिक तथा निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की घटनाओं की निंदा करते हुए प्रदर्शनकारियों में शामिल उन लोगों को निशाने पर लिया, जो विरोध प्रदर्शनों का इस्तेमाल हिंसा और तोड़फोड़ के लिए कर रहे थे।
उन्होंने सभी पक्षों से तनाव कम करने और आगे की हिंसा रोकने की अपील की तथा समावेशी और सुरक्षित संवाद को आगे बढ़ने का सबसे बेहतर रास्ता बताया। हालांकि, भारत में प्रदर्शनों को लेकर संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों की टिप्पणियों और यूरोप में हिंसक घटनाओं पर दिए गए बयानों के बीच अंतर को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की भूमिका का उल्लेख
भारतीय राजनयिक ने मानवाधिकारों से जुड़ी शिकायतों के समाधान में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और राज्य मानवाधिकार आयोगों की भूमिका का भी उल्लेख किया। भारत का कहना है कि मानवाधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होने वाली चर्चा निष्पक्ष, प्रमाण-आधारित और संवाद पर केंद्रित होनी चाहिए।
भारत ने दोहराया कि मानवाधिकारों के मामलों में किसी भी देश का आकलन अपुष्ट आरोपों या राजनीतिक विचारों के आधार पर नहीं, बल्कि सत्यापित तथ्यों और निष्पक्ष मानकों के आधार पर किया जाना चाहिए।









