संयुक्त राष्ट्र में भारत की दोटूक: वीटो का इस्तेमाल संकीर्ण राजनीतिक हितों के लिए न हो

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डेस्क : भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में व्यापक सुधारों की मांग दोहराते हुए कहा है कि वीटो शक्ति का इस्तेमाल संकीर्ण राजनीतिक हितों को साधने के साधन के रूप में नहीं किया जाना चाहिए। भारत ने जोर दिया कि वीटो का अधिकार अपने साथ बड़ी जिम्मेदारी लेकर आता है और इसका उपयोग अंतरराष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए अत्यंत संयम से किया जाना चाहिए।

संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि राजदूत परवथनेनी हरीश ने सुरक्षा परिषद में वीटो के इस्तेमाल पर चिंता जताते हुए कहा कि मौजूदा व्यवस्था में कुछ देशों के हाथों में निर्णय लेने की असमान शक्ति केंद्रित है। इससे परिषद की विश्वसनीयता और निष्पक्षता पर सवाल खड़े होते हैं।

331 बार इस्तेमाल हुआ वीटो

भारतीय राजदूत ने वीटो के ऐतिहासिक रिकॉर्ड का उल्लेख करते हुए बताया कि संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के बाद से वीटो का इस्तेमाल 331 बार किया जा चुका है, जो लगभग 200 प्रस्तावों से जुड़ा रहा है। उन्होंने कहा कि वीटो के इस्तेमाल पर जवाबदेही तय करने के उद्देश्य से वर्ष 2022 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में एक व्यवस्था शुरू की गई थी। इसके तहत सुरक्षा परिषद के किसी स्थायी सदस्य द्वारा वीटो लगाए जाने पर महासभा में चर्चा का प्रावधान किया गया।

हालांकि, भारत के अनुसार, इस व्यवस्था के बावजूद वीटो का इस्तेमाल जारी रहना बताता है कि केवल चर्चा और जवाबदेही की मौजूदा प्रक्रिया पर्याप्त नहीं है।

सुरक्षा परिषद में व्यापक सुधार की जरूरत

भारत ने स्पष्ट किया कि वीटो के मुद्दे को सुरक्षा परिषद के अन्य सुधारों से अलग करके नहीं देखा जा सकता। परिषद की सदस्यता की श्रेणियों, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व, सदस्यों की संख्या और कामकाज के तरीकों सहित सभी प्रमुख मुद्दों पर एक साथ बातचीत जरूरी है।

राजदूत हरीश ने सुधार प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए स्पष्ट समयसीमा और लक्ष्य निर्धारित करते हुए लिखित वार्ता शुरू करने की मांग की। भारत का मानना है कि केवल वीटो पर चर्चा करने से उन पांच स्थायी सदस्यों की निर्णय प्रक्रिया में मौजूद असमानता दूर नहीं होगी, जिनके पास वर्तमान में वीटो का अधिकार है।

अप्रत्यक्ष वीटो पर भी जताई चिंता

भारत ने सुरक्षा परिषद में ऐसे अप्रत्यक्ष अवरोधों का भी मुद्दा उठाया, जिनके जरिए कोई एक सदस्य राष्ट्रपति के वक्तव्यों, प्रेस बयानों या प्रतिबंध समितियों के फैसलों को रोक सकता है। भारतीय पक्ष के अनुसार, सहमति बनाने की अनौपचारिक प्रक्रिया कई बार किसी प्रस्ताव को बिना स्पष्ट कारण बताए रोकने का माध्यम बन जाती है।

भारत ने दोहराया कि यदि वीटो का अधिकार भविष्य में भी बना रहता है, तो सुधार के बाद परिषद में शामिल होने वाले सभी स्थायी सदस्यों को समान अधिकार और जिम्मेदारियां मिलनी चाहिए। स्थायी सदस्यों की एक अलग श्रेणी बनाना, जिसे वीटो का अधिकार मिले या न मिले, मौजूदा असमानता को और बढ़ा सकता है।

भारत ने अफ्रीकी देशों की साझा मांगों के प्रति भी समर्थन जताया और कहा कि सुरक्षा परिषद को अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण, जवाबदेह और न्यायसंगत बनाया जाना चाहिए। भारत का रुख स्पष्ट है कि संयुक्त राष्ट्र की निर्णय प्रक्रिया में सुधार के बिना वैश्विक शांति और सुरक्षा से जुड़े मामलों में परिषद की प्रभावशीलता और विश्वसनीयता को मजबूत करना मुश्किल होगा।