सपा बैठक में अनुशासनहीनता पर अखिलेश यादव का बड़ा एक्शन

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लखनऊ। उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच समाजवादी पार्टी (सपा) के भीतर अंदरूनी कलह और गुटबाजी खुलकर सामने आ गई है। पार्टी मुख्यालय पर रणनीति तय करने के लिए बुलाई गई समीक्षा बैठक के दौरान सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के सामने ही दो वरिष्ठ नेता आपस में भिड़ गए। तीखी नोकझोंक और हंगामे से नाराज अखिलेश यादव ने सख्त कदम उठाते हुए एटा और कासगंज जिलों की कार्यकारिणी को तत्काल प्रभाव से भंग कर दिया है। इसके साथ ही दोनों जिलों के जिलाध्यक्षों और प्रदेश कार्यकारिणी में शामिल स्थानीय पदाधिकारियों को भी पदमुक्त कर दिया गया है।

बैठक के दौरान बिगड़े हालात सूत्रों के अनुसार, एटा और कासगंज के करीब 250 प्रमुख पदाधिकारियों की यह बैठक दोपहर लगभग 12 बजे शुरू हुई थी। अखिलेश यादव की मौजूदगी में चुनावी हार के कारणों पर मंथन चल रहा था। इसी दौरान मंजीत यादव ने अपनी बात रखनी शुरू की, जिस पर एटा जिला पंचायत के पूर्व अध्यक्ष जोगेंद्र सिंह यादव ने आपत्ति जताई। देखते ही देखते दोनों नेताओं के बीच कहासुनी शुरू हो गई और बात गाली-गलौज तक पहुंच गई। हालांकि, वहां मौजूद अन्य नेताओं ने हस्तक्षेप कर किसी तरह मामला शांत कराने का प्रयास किया।

‘पैसे की गर्मी…’ कहकर बैठक से उठे अखिलेश पार्टी में अनुशासनहीनता से बेहद नाराज दिखे अखिलेश यादव ने नेताओं को नसीहत देते हुए कहा कि सभी को पार्टी के दायरे में रहकर काम करना चाहिए। तंज कसते हुए सपा प्रमुख ने कहा, “यह सब केवल पैसे की गर्मी है। जिसके पास अधिक पैसा आ जाता है, वह अपनी मर्जी से काम करने लगता है।” इसके बाद अखिलेश यादव नाराजगी जताते हुए बीच बैठक से ही उठकर चले गए। घटना के एक घंटे के भीतर ही एटा और कासगंज की संगठनात्मक इकाइयों को भंग करने का फरमान जारी कर दिया गया।

दोनों नेताओं ने मांगी माफी कार्रवाई के बाद बैकफुट पर आए दोनों नेताओं ने अपने व्यवहार पर खेद व्यक्त किया है। मीडिया को दिए बयान में उन्होंने पार्टी के प्रति वफादारी जताते हुए कहा कि वे सपा के अनुशासित सिपाही हैं और नेतृत्व के हर निर्णय का सम्मान करते हैं।

गौरतलब है कि राजनीतिक दृष्टि से ये दोनों जिले बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं। एटा की सभी चार विधानसभा सीटों पर जहां भारतीय जनता पार्टी का कब्जा है, वहीं कासगंज सपा का मजबूत गढ़ रहा है, जहां की चार में से तीन सीटों पर पार्टी का कब्जा है। चुनाव से ठीक पहले संगठन में हुए इस घटनाक्रम ने सपा नेतृत्व की चिंता बढ़ा दी है।