नई दिल्ली : भारत के पूर्व सॉलिसिटर जनरल और वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने जेन-जी प्रदर्शनों के बीच कहा है कि लोकतंत्र में सरकार और उसके संस्थानों की आलोचना जरूरी है, लेकिन आलोचना के दौरान देश की छवि को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों से बचना चाहिए। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया के दौर में देश के भीतर कही या की गई कोई भी बात दुनिया भर में पहुंचती है।
सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के एक कार्यक्रम में हालिया घटनाक्रमों पर चर्चा करते हुए साल्वे ने कहा कि सरकार की सार्वजनिक आलोचना इसलिए जरूरी है, ताकि सत्ता में बैठे लोग जवाबदेह रहें और उन पर नजर बनी रहे। हालांकि, उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सरकार की आलोचना और देश की छवि को नुकसान पहुंचाना दो अलग-अलग बातें हैं।
साल्वे ने कहा कि भारत को इस समय दुनिया में सम्मान की नजर से देखा जा रहा है। उनके मुताबिक, भारत की बढ़ती भूमिका और उसकी प्रगति पर वैश्विक स्तर पर चर्चा हो रही है। उन्होंने कहा कि ऐसे समय में देश के भीतर होने वाली गतिविधियों और सार्वजनिक बयानों के अंतरराष्ट्रीय प्रभाव को भी ध्यान में रखना चाहिए।
उन्होंने सोशल मीडिया के प्रभाव का जिक्र करते हुए कहा कि आज कोई भी बयान या गतिविधि केवल देश की सीमाओं तक सीमित नहीं रहती। इसलिए सरकार के फैसलों पर सवाल उठाते समय यह भी देखना चाहिए कि उससे भारत की प्रतिष्ठा प्रभावित तो नहीं हो रही है।
साल्वे की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब जेन-जी प्रदर्शनों को लेकर देश में राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज है। इन प्रदर्शनों में युवाओं ने विभिन्न मुद्दों को लेकर सरकार के खिलाफ अपनी नाराजगी जाहिर की है। प्रदर्शन के दौरान कुछ नेताओं और सरकार के खिलाफ इस्तेमाल की गई भाषा को लेकर भी बहस हुई है।
साल्वे ने अपने बयान में सरकार की आलोचना के अधिकार का समर्थन करते हुए साथ ही यह संदेश दिया कि लोकतांत्रिक विरोध के दौरान राष्ट्रीय हित और देश की वैश्विक छवि का भी ध्यान रखा जाना चाहिए।








