सरकारी स्कूलों पर बड़ा सवाल, 84 हजार स्कूल कम हुए तो 1.5 करोड़ छात्र भी घटे

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डेस्क : देश में सरकारी स्कूलों की स्थिति को लेकर सामने आई एक रिपोर्ट ने शिक्षा व्यवस्था की कई गंभीर चुनौतियों को उजागर किया है। आंकड़ों के मुताबिक 2018-19 से 2025-26 के बीच देश में करीब 84 हजार सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूल कम हुए, जबकि इन स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों की संख्या करीब 1.5 करोड़ घट गई। हालांकि, स्कूलों की संख्या में कमी का एक कारण कम नामांकन वाले स्कूलों का विलय भी बताया गया है।

सरकारी स्कूलों में घट रहा नामांकन

रिपोर्ट के अनुसार सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में छात्रों की संख्या 2018-19 में करीब 15.90 करोड़ थी, जो 2025-26 में घटकर 14.40 करोड़ रह गई। इसी अवधि में निजी स्कूलों में करीब 70 लाख छात्रों की संख्या बढ़ी है। विशेषज्ञों के मुताबिक जनसांख्यिकीय बदलाव इसका एक कारण है, लेकिन निजी स्कूलों की ओर बढ़ता रुझान भी सरकारी शिक्षा व्यवस्था के लिए चिंता का विषय है।

ग्रामीण भारत में सरकारी स्कूलों की भूमिका सबसे अहम है। यहां करीब 66 फीसदी छात्र सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह आंकड़ा करीब 30 फीसदी है। ऐसे में सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता और सुविधाओं का सीधा असर बड़ी आबादी के बच्चों की शिक्षा पर पड़ता है।

करीब 63 हजार स्कूलों में शौचालय की सुविधा नहीं

बुनियादी सुविधाओं की स्थिति भी पूरी तरह संतोषजनक नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार केवल 94.2 फीसदी सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में उचित शौचालय उपलब्ध हैं। इसका मतलब है कि देश में करीब 63 हजार स्कूल अभी भी इस सुविधा से वंचित हैं। हालांकि 2018-19 में यह आंकड़ा 93.7 फीसदी था, यानी धीरे-धीरे सुधार हुआ है।

कंप्यूटर और इंटरनेट जैसी डिजिटल सुविधाओं के मामले में भी सरकारी स्कूल कई जगह निजी स्कूलों से पीछे हैं। हालांकि देश के स्कूलों में डिजिटल सुविधाओं का विस्तार हो रहा है। UDISE+ के ताजा आंकड़ों के अनुसार 2025-26 में कंप्यूटर सुविधा वाले स्कूलों का अनुपात 69.9 फीसदी पहुंच गया, जो 2024-25 में 64.7 फीसदी था।

पढ़ाई की गुणवत्ता भी बड़ी चुनौती

सिर्फ स्कूल और सुविधाएं उपलब्ध कराना ही पर्याप्त नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों में सीखने के स्तर को लेकर भी चिंता बनी हुई है। ASER 2024 के आंकड़े सरकारी स्कूलों में बुनियादी पढ़ने और गणितीय क्षमता में कई स्तरों पर कमी की ओर इशारा करते हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक करीब 1,04,125 एकल-शिक्षक स्कूलों में लगभग 33 लाख बच्चे पढ़ते हैं। ऐसे स्कूलों में शिक्षकों पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है, जिसका असर पढ़ाई की गुणवत्ता पर भी पड़ सकता है।

शिक्षा पर राज्यों का खर्च कितना?

भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार राज्यों ने हाल के वर्षों में अपने बजट का औसतन 13-14 फीसदी शिक्षा पर खर्च किया है। यह यूनेस्को की 15-20 फीसदी की अनुशंसित सीमा से कम है। बिहार, उत्तराखंड, राजस्थान और छत्तीसगढ़ ऐसे राज्यों में शामिल हैं, जिन्होंने 2018-19 से औसतन अपने बजट का 15 फीसदी से अधिक शिक्षा पर खर्च किया।

रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि सरकारी स्कूलों को मजबूत करने के लिए केवल भवन और बुनियादी सुविधाओं पर ही नहीं, बल्कि शिक्षकों की उपलब्धता, शिक्षण की गुणवत्ता, डिजिटल संसाधनों और स्थानीय स्तर पर निगरानी पर भी ध्यान देने की जरूरत है। सरकारी स्कूल आज भी देश की शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ हैं, खासकर ग्रामीण भारत में।