जयपुर : मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ ने कहा कि मनुष्य की सरलता ही उसे अपनी भूलों को स्वीकार करने और उनमें सुधार करने की प्रेरणा देती है। सरल व्यक्ति अपनी भूल को सहजता से स्वीकार कर लेता है, जबकि कुटिल व्यक्ति उसे नकारने और छिपाने का प्रयास करता है। अपनी भूलों को स्वीकार कर उनका प्रायश्चित करना आत्मशुद्धि की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
मालवीय नगर स्थित अणुविभा केन्द्र के महाप्रज्ञ सभागार में गुरुवार को आयोजित धार्मिक सभा में जैन शास्त्र आगम आधारित प्रवचन करते हुए मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ ने कहा कि ‘आलोयणा’ जैन दर्शन का एक पारिभाषिक शब्द है, जिसका भावार्थ है—गुरु के समक्ष अपनी भूलों को यथावत निवेदित करना और उनके लिए प्रायश्चित लेना। उन्होंने कहा कि यह प्रक्रिया तभी संभव है, जब व्यक्ति के भीतर सरलता और आत्मस्वीकार का भाव हो।
मुनिश्री ने कहा कि सरलता व्यक्ति को सद्गति की ओर ले जाती है, जबकि माया-कपट उसे दुर्गति की ओर ले जाता है। भगवान महावीर के कथन का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति ऋजु अर्थात सरल होता है, वह स्त्री वेद और नपुंसक वेद कर्म के बंधन से मुक्त रहता है। यदि पूर्व में इन कर्मों का बंध हुआ हो तो सरलता और आत्मशुद्धि के माध्यम से उससे भी मुक्ति प्राप्त की जा सकती है।
इस अवसर पर मुनिश्री ने श्रद्धालुओं को तत्त्वज्ञान से अवगत कराया तथा ‘भरत मुक्ति’ गेय व्याख्यान का वाचन भी किया।
मुनिश्री संभव कुमार जी महाराज ने कहा कि मायावी व्यक्ति पर कोई विश्वास नहीं करता। अहंकार का त्याग किए बिना अपनी गलती स्वीकार करना कठिन है। अहंकारी और मायावी व्यक्ति अपनी भूल को स्वीकार करने के बजाय उसे सही साबित करने का प्रयास करता है। उन्होंने कहा कि भूल को स्वीकार कर उसमें सुधार करने के लिए व्यक्ति को भीतर से सरल बनना आवश्यक है।
कार्यक्रम का शुभारंभ तीर्थंकर शीतल प्रभु की स्तुति से हुआ। धार्मिक सभा का समापन त्याग-प्रत्याख्यान के साथ हुआ।








