धर्म का मूल है विनय, विनय करो–सफल बनो: मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’

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जयपुर : मालवीय नगर स्थित अणुविभा केन्द्र में बुधवार को मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ एवं मुनिश्री संभव कुमार जी के पावन सान्निध्य में ‘ज्ञानार्थी प्रेरणा दिवस’ का आयोजन हुआ। आध्यात्मिक वातावरण में आयोजित इस कार्यक्रम में मुनिवरों ने जीवन में विनय, नम्रता, सहनशीलता और समभाव के महत्त्व को समझाते हुए कहा कि विनय केवल एक सद्गुण नहीं, बल्कि आत्म-विकास और मोक्ष की दिशा में आगे बढ़ने का मार्ग है।

मुनिश्री ने जैन दर्शन के मूल सिद्धांत को स्पष्ट करते हुए कहा, “धर्म का मूल ही विनय है।” दशवैकालिक सूत्र में भी ‘विणओ धम्मस्स मूलं’ अर्थात विनय को धर्म का मूल बताया गया है। उन्होंने कहा कि जीवन में वास्तविक सफलता प्राप्त करने के लिए अहंकार का त्याग कर विनम्रता को अपनाना आवश्यक है। विनयवान व्यक्ति ही गुरु की कृपा और मार्गदर्शन का सच्चा अधिकारी बनता है।

विनय से होता है व्यक्तित्व का विकास

ज्ञानार्थियों को संबोधित करते हुए मुनिश्री ने सच्चे विनीत व्यक्ति के गुणों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति स्वभाव से शांत, विचारों से सकारात्मक, व्यवहार में विनम्र तथा गुरु की आज्ञा का पालन करने वाला होता है, वही वास्तव में विनीत कहलाता है। कठिन परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखना, परिश्रम करना और दूसरों के प्रति सम्मान का भाव रखना विनय की पहचान है।

उन्होंने कहा कि अहंकार व्यक्ति के विकास में बाधा बनता है, जबकि विनम्रता उसे सीखने, समझने और आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। जीवन में जितना अधिक विनय होगा, उतनी ही सहजता से व्यक्ति अपने भीतर सकारात्मक परिवर्तन ला सकेगा।

सहनशीलता ही सच्ची तपस्या

जैन धर्म में क्षमा और सहनशीलता के महत्त्व को रेखांकित करते हुए मुनिश्री ने कहा कि अनुकूल परिस्थितियों में शांत रहना सहज हो सकता है, लेकिन प्रतिकूल परिस्थितियों में भी समभाव बनाए रखना ही वास्तविक साधना है।

उन्होंने कहा कि कभी-कभी व्यक्ति निर्दोष होने पर भी आलोचना, अपमान अथवा विपरीत व्यवहार का सामना करता है। ऐसी स्थिति में क्रोध और प्रतिशोध की भावना से बचते हुए धैर्य एवं विवेक बनाए रखना आत्मबल की पहचान है। सहनशीलता का अर्थ कमजोरी नहीं, बल्कि अपने मन और भावनाओं पर नियंत्रण रखने की क्षमता है।

मुनिश्री ने ज्ञानार्थियों को जीवन में अपनाने के लिए दो प्रेरक सूत्र दिए— “सहन करो–सफल बनो” और “विनय करो–सफल बनो।” उन्होंने कहा कि इन सूत्रों को व्यवहार में उतारने वाला व्यक्ति न केवल अपने व्यक्तित्व को निखार सकता है, बल्कि अपने जीवन को भी अधिक शांत, सार्थक और आध्यात्मिक बना सकता है।

तीर्थंकर स्तुति और आध्यात्मिक संकल्पों के साथ समापन

कार्यक्रम का मंगलारंभ जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर की पावन स्तुति से हुआ। इसके बाद ज्ञानार्थियों ने विशेष आध्यात्मिक संकल्प ग्रहण किए। भिक्षु भक्ति से ओतप्रोत सुमधुर गीतों के संगान ने वातावरण को भक्तिमय बना दिया।

मुनिवरों के प्रेरक उद्बोधन और आध्यात्मिक संदेशों के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। आयोजन ने उपस्थित ज्ञानार्थियों एवं श्रावक-श्राविकाओं को यह संदेश दिया कि जीवन में सच्ची उन्नति केवल ज्ञान अर्जित करने से नहीं, बल्कि उस ज्ञान के साथ विनय, क्षमा, सहनशीलता और समभाव को अपनाने से संभव है।