बोलने और न बोलने में विवेक रखना है विशेष बात : महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमण

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लाडनूं : जन-जन के मानस को आध्यात्मिक सिंचन प्रदान करने वाले, जन-जन को सद्भावना, नैतिकता व नशामुक्ति का संदेश देने वाले जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, अखण्ड परिव्राजक, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने मंगलवार को सुधर्मा सभा में आयोजित प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘वाग् गुप्तता से क्या मिलेगा?’ को आगम के माध्यम से पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि साधु के लिए तीन गुप्तियां निर्दिष्ट हैं। गृहस्थ भी यदि इन तीन गुप्तियों के पालन का प्रयास करे तो वह उसके लिए भी हितकर हो सकता है।
वाणी के संदर्भ में गोपन करना वाग् गुप्तता होती है। वाणी संयम रखना, वाग् गुप्तता एक साधना का प्रयोग है। वाणी संयम के लिए मौन की साधना भी की जाती है। वाणी संयम जो प्रतिदिन ही रखने का प्रयास करना चाहिए। बोलना आदमी के जीवन का एक व्यवहार है। जीवन की व्यवस्था को चलाने में वाणी का सहयोग भी रहता है। बोलकर मनुष्य अपने विचारों का आदान-प्रदान करता है। प्रवचन देना भी तो वाणी का ही प्रयोग है। मौन की बात को बताने के लिए वाणी का प्रयोग करना होता है।
वक्ता होता है तो श्रोता भी होते हैं। वक्ता यदि कोई साधु हो, ज्ञानी हो और वह कोई बात बताता है तो उस वाणी से कितनी कल्याणकारी बातें प्राप्त हो सकती हैं। जिसमें प्रज्ञा, प्रतिभा है, ज्ञान का अच्छा विकास है तो वह वाणी अथवा प्रवचन और भी अच्छा हो सकता है। प्रवचन को सारपूर्ण बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए। हर जगह लकीर का फकीर नहीं बनना चाहिए। जीवन में कुछ नया भी किया जा सकता है और पुराने को छोड़ा भी जा सकता है।
शुद्ध आचार और विचार के साथ नए विकास का प्रयास किया जा सकता है। जो भी संगठन हो, उसके मुखिया के भीतर साहस का भाव रहे। मूल को सुरक्षित करते हुए, समीक्षा आदि के बाद ही संगठन के विकास का प्रयास हो। संगठन में अनुशासन बहुत ही महत्त्वपूर्ण तत्व है। अनुशासन के साथ नवीन विकास का प्रयास करना चाहिए। मूल कमजोर न हो, मूल सुरक्षित रहे तो विकास की ज्यादा संभावना होती है। संगठन का मूल मजबूत रहना चाहिए। इसके लिए अनुशासन, विनय, आचार अच्छा रहना चाहिए। वाणी का अच्छा प्रयोग भी और वाणी का संयम भी रखने का प्रयास हो। वाणी से झूठ, कपट और कटुता न हो तो वाणी अच्छी रह सकती है। बोलने और न बोलने में विवेक रखना विशेष बात होती है। कार्यक्रम के दौरान साध्वी संवेगप्रभाजी ने आचार्यश्री से आठ की तपस्या का प्रत्याख्यान किया।