डेस्क : भारत में पैकेज्ड खाद्य और पेय पदार्थों पर चेतावनी लेबल को लेकर बहस तेज हो गई है। सवाल यह उठ रहा है कि एक ही वैश्विक ब्रांड के उत्पाद पर विदेशों में स्वास्थ्य संबंधी चेतावनी प्रमुखता से दिखाई जाती है, जबकि भारत में वही जानकारी अपेक्षाकृत छोटे अक्षरों में पीछे दी जाती है। इस अंतर को लेकर स्वास्थ्य विशेषज्ञ और उपभोक्ता अधिकार कार्यकर्ता सवाल उठा रहे हैं।
मामला खास तौर पर फैंटा जैसे शीतल पेय से जुड़ा है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक ब्रिटेन में बिकने वाले फैंटा और भारत में बिकने वाले फैंटा की पोषण संरचना में अंतर है। ब्रिटेन में कुछ उत्पादों पर स्पष्ट पोषण संबंधी संकेत दिए जाते हैं, जबकि भारत में फिलहाल सामने की तरफ इसी तरह के रंग आधारित चेतावनी लेबल अनिवार्य नहीं हैं।
भारत में चेतावनी लेबल पर क्या विवाद है?
भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण लंबे समय से पैकेज्ड खाद्य पदार्थों पर सामने की तरफ पोषण संबंधी चेतावनी देने के विकल्पों पर विचार करता रहा है। प्रस्तावों में अधिक चीनी, नमक और वसा वाले उत्पादों के लिए रंग आधारित संकेत और अन्य पोषण संबंधी रेटिंग शामिल रही हैं।
स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का तर्क है कि उपभोक्ता को पैकेट के सामने ही यह साफ पता चलना चाहिए कि किसी उत्पाद में चीनी, नमक या वसा की मात्रा कितनी अधिक है। उनका कहना है कि केवल पीछे दी गई जानकारी से आम उपभोक्ता के लिए सही फैसला लेना मुश्किल हो सकता है। करीब २० देशों में अलग-अलग तरह के सामने वाले पोषण लेबल पहले से इस्तेमाल किए जा रहे हैं।
कंपनियों और नियामक के बीच मतभेद
रॉयटर्स के अनुसार मार्च में खाद्य उद्योग के प्रतिनिधियों और नियामक के बीच हुई बैठक में कंपनियों की ओर से सामने वाले चेतावनी लेबल की प्रभावशीलता पर सवाल उठाए गए। उद्योग का तर्क रहा कि ऐसे संकेत उपभोक्ताओं को भ्रमित कर सकते हैं और केवल लेबल देखकर उनकी खान-पान की आदतों में बड़ा बदलाव जरूरी नहीं आएगा।
दूसरी ओर, स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि उत्पाद की पोषण संबंधी जानकारी जितनी स्पष्ट होगी, उपभोक्ता उतना ही बेहतर निर्णय ले सकेगा। इसी मुद्दे पर स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं ने उच्चतम न्यायालय का भी रुख किया है।
करीब ८० प्रतिशत उत्पादों पर पड़ सकता है असर
रिपोर्ट के अनुसार भारत के १०० अरब डॉलर से अधिक के पैकेज्ड खाद्य और पेय बाजार में उद्योग के अनुमान के मुताबिक करीब ८० प्रतिशत उत्पाद ऐसे हो सकते हैं जिनमें चीनी, नमक या वसा की मात्रा अधिक है। ऐसे में यदि रंग आधारित चेतावनी व्यवस्था लागू होती है तो बड़ी संख्या में उत्पादों के पैकेट पर स्पष्ट चेतावनी दिखाई दे सकती है।
उद्योग की ओर से यह भी चिंता जताई गई है कि एक समान नियम अलग-अलग उत्पादों पर लागू करने से कुछ ऐसे उत्पाद भी चेतावनी श्रेणी में आ सकते हैं जिनमें प्राकृतिक रूप से चीनी मौजूद होती है।
सवाल उपभोक्ता के अधिकार का
इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा सवाल यही है कि भारत में बिकने वाले खाद्य और पेय उत्पादों के उपभोक्ताओं को वही स्पष्ट जानकारी क्यों नहीं मिलनी चाहिए, जो कई दूसरे देशों में दी जाती है।
फिलहाल सामने वाले चेतावनी लेबल को लेकर सरकार, नियामक, खाद्य कंपनियों और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के बीच मतभेद जारी हैं। उच्चतम न्यायालय की निगरानी में यह मुद्दा आगे किस दिशा में जाता है, इस पर उपभोक्ताओं और स्वास्थ्य क्षेत्र की नजर बनी हुई है।








