भूख, बेबसी और संघर्ष के बीच जावेद अख्तर ने देखा था बड़े पर्दे का सपना

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मुंबई : हिंदी सिनेमा के दिग्गज गीतकार और पटकथा लेखक जावेद अख्तर ने अपने शुरुआती संघर्ष के दिनों को याद करते हुए बताया कि मुंबई में करियर बनाने की राह उनके लिए बेहद मुश्किल रही। एक समय ऐसा भी आया, जब उन्हें लगातार तीन दिन तक बिना खाना खाए रहना पड़ा। इसके बावजूद उन्होंने अपने सपने को छोड़ने के बारे में नहीं सोचा।

जावेद अख्तर ने बताया कि वर्ष 1964 में महज 19 साल की उम्र में वह फिल्मकार बनने का सपना लेकर बॉम्बे पहुंचे थे। उस समय उनकी आंखों में राज कपूर और गुरु दत्त जैसे बड़े फिल्मकारों के साथ काम करने का सपना था। हालांकि मुंबई पहुंचने के बाद परिस्थितियां उनके अनुकूल नहीं रहीं। शुरुआती वर्षों में उन्हें आर्थिक तंगी के साथ रहने और खाने तक की परेशानी का सामना करना पड़ा।

उन्होंने बताया कि संघर्ष के दिनों में कई बार उनके पास इतने पैसे भी नहीं होते थे कि वह अपना खाना खरीद सकें। एक दौर में वह तीन दिन तक भूखे रहे। रहने के लिए भी कभी ठिकाना होता था तो कभी नहीं। इसके बावजूद उन्होंने मुंबई छोड़ने या अपने सपने से पीछे हटने का फैसला नहीं किया।

आर्थिक स्थिति संभालने के लिए जावेद अख्तर को छोटे-मोटे लेखन के काम मिलने लगे। वह फिल्मों के लिए घोस्ट राइटिंग करते थे और अलग-अलग दृश्यों के लिए संवाद तथा कहानी लिखते थे। एक दृश्य लिखने के लिए उन्हें करीब 100 रुपये मिलते थे। धीरे-धीरे यही छोटे काम उनके लिए आगे बढ़ने का रास्ता बने।

जावेद अख्तर ने बताया कि उनके पास कभी कोई दूसरा विकल्प नहीं था। उन्हें विश्वास था कि वह एक दिन कामयाब होंगे। मुंबई आने के करीब पांच साल बाद उन्होंने पहली बार आरके स्टूडियो देखा। जिस फिल्मी दुनिया में जगह बनाने का सपना लेकर वह शहर आए थे, वहां पहुंचने में उन्हें वर्षों का संघर्ष करना पड़ा।

जनवरी 1970 में उनके करियर को पहली बड़ी सफलता मिली। इसके बाद उनकी पहचान बतौर पटकथा लेखक और गीतकार मजबूत होती गई। आगे चलकर उन्होंने हिंदी सिनेमा को कई यादगार कहानियां, संवाद और गीत दिए।

जावेद अख्तर की संघर्ष यात्रा बताती है कि सफलता के पीछे अक्सर वर्षों की मेहनत और कठिन दौर छिपा होता है। तीन दिन की भूख से लेकर हिंदी सिनेमा के शीर्ष लेखकों में शामिल होने तक का उनका सफर आज भी नए कलाकारों और लेखकों के लिए प्रेरणा है।