डेस्क : अगस्त में पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किए के बीच हुए रक्षा समझौते के बाद बने नए रणनीतिक समीकरणों में महज एक महीने के भीतर ही मतभेद के संकेत सामने आने लगे हैं। सऊदी अरब ने अफगानिस्तान के साथ एक बड़ा ऊर्जा समझौता किया है, जिसे पाकिस्तान के लिए कूटनीतिक झटके के तौर पर देखा जा रहा है।
7 अगस्त को मक्का में सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किए ने एक संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। समझौते के अनुसार, किसी एक सदस्य देश पर सशस्त्र हमला तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। इस प्रावधान के चलते इस समझौते की तुलना NATO के सामूहिक रक्षा प्रावधान से की गई और इसे ‘इस्लामिक NATO’ भी कहा गया।
हालांकि, समझौते के तुरंत बाद सामने आए घटनाक्रमों ने इसकी वास्तविक प्रभावशीलता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सऊदी अरब और ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों के बीच बढ़ते तनाव के बीच पाकिस्तान ने सैन्य कार्रवाई को लेकर सावधानी बरती है। पाकिस्तान की ओर से कहा गया है कि मक्का रक्षा समझौते के तहत फिलहाल किसी सैन्य कार्रवाई पर चर्चा नहीं हुई है।
अफगानिस्तान में सऊदी निवेश
इसी बीच सऊदी अरब ने अफगानिस्तान के साथ ऊर्जा क्षेत्र में महत्वपूर्ण समझौता किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, तालिबान के नेतृत्व वाले अफगान प्रशासन और सऊदी ऊर्जा कंपनी डेल्टा इंटरनेशनल के बीच पश्चिमी कुशक-तिरपुल बेसिन में तेल और गैस की खोज के लिए 25 वर्ष का करीब 20 करोड़ डॉलर का समझौता हुआ है।
इस समझौते को अफगानिस्तान में सऊदी अरब के बढ़ते आर्थिक और रणनीतिक हितों के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। पश्चिमी अफगानिस्तान के हेरात और बदगिस प्रांतों से जुड़े इस ऊर्जा क्षेत्र में निवेश रियाद के लिए एक नए क्षेत्रीय जुड़ाव की शुरुआत माना जा रहा है।
पाकिस्तान के प्रभाव को चुनौती
सऊदी अरब का अफगानिस्तान के साथ सीधे आर्थिक संबंध मजबूत करना पाकिस्तान के लिए अहम माना जा रहा है। अफगानिस्तान लंबे समय से पाकिस्तान की क्षेत्रीय रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। ऐसे में रियाद का काबुल के साथ सीधे आर्थिक और ऊर्जा संबंध बढ़ाना इस्लामाबाद के पारंपरिक प्रभाव के लिए चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।
खास बात यह है कि सऊदी अरब ने पाकिस्तान में भी बड़े निवेश की घोषणा की थी। हालांकि, पाकिस्तान में प्रस्तावित निवेश योजनाओं की रफ्तार उम्मीद के मुताबिक आगे नहीं बढ़ सकी। इसके विपरीत, अफगानिस्तान में सऊदी कंपनी के साथ हुए समझौते ने क्षेत्र में रियाद की स्वतंत्र रणनीति को सामने ला दिया है।
हूती संकट में पाकिस्तान की मुश्किल
मक्का रक्षा समझौते की परीक्षा ऐसे समय में हो रही है, जब सऊदी अरब और ईरान समर्थित हूतियों के बीच तनाव बढ़ रहा है। सऊदी अरब पर हूती हमलों के बाद क्षेत्रीय सुरक्षा स्थिति और जटिल हुई है। सऊदी अरब की सैन्य कार्रवाई और पाकिस्तान की अपेक्षाकृत सतर्क प्रतिक्रिया ने दोनों देशों की रणनीतिक प्राथमिकताओं के बीच संभावित अंतर को उजागर किया है।
पाकिस्तान के सामने एक ओर सऊदी अरब के साथ रक्षा संबंध मजबूत रखने की चुनौती है, तो दूसरी ओर ईरान के साथ अपने संबंधों को संतुलित करने की जरूरत भी है। यही वजह है कि नए रक्षा गठबंधन की वास्तविक सैन्य प्रतिबद्धताओं और भविष्य की भूमिका को लेकर सवाल उठ रहे हैं।








