जप द्वारा भाव व परिणामों की हो सकती है शुद्धि : सिद्ध साधक आचार्यश्री महाश्रमण

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लाडनूं : जैन धर्म का महापर्व पर्युषण लाडनूं की धरा पर स्थित जैन विश्व भारती के सुरम्य व विशाल परिसर में विराजमान जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में सानंद रूप में मनाया जा रहा है। हजारों-हजारों श्रद्धालु इस आध्यात्मिक महोत्सव का लाभ प्राप्त करने के लिए गुरु सन्निधि में पहुंचे हुए हैं। लोगों की उपस्थिति से जैन विश्व भारती परिसर ही नहीं, अपितु पूरा लाडनूं नगर ही गुलजार नजर आ रहा है। इन सात दिवसों के बाद अष्टम दिवस यानी 15 सितम्बर को भगवती संवत्सरी का महापर्व का आयोजन होना है। इस दिन सुबह सात बजे से जो व्याख्यान का क्रम प्रारम्भ होता है, वह प्रायः सायंकाल चलता रहता है। इस दिन सभी साधु, साध्वी ही नहीं, श्रावक-श्राविकाएं भी प्रायः उपवास करते हैं।
रविवार को पर्वाधिराज पर्युषण का छठा दिन जप दिवस के रूप में समायोजित हुआ। कार्यक्रम के दौरान जप दिवस पर साध्वी स्तुतिप्रभाजी ने गीत का संगान किया। साध्वीवर्या सम्बुद्धयशाजी ने प्रथम जैन आगम ‘आचारांग’ के संदर्भ में अपनी अभिव्यक्ति दी। जप दिवस के संदर्भ में साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभाजी ने उपस्थित जनता को उद्बोधित किया। युवाचार्यश्री महावीरकुमारजी ने तप-त्याग धर्म को व्याख्यायित किया।
मानवता के मसीहा, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने पर्वाधिराज पर्युषण के दौरान ‘भगवान महावीर की अध्यात्म यात्रा’ के प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए कहा कि भगवान महावीर की आत्मा पच्वीसवें भव में राजघराने में छत्रा नामक नगरी के राजा जितशत्रु की महारानी भद्रा की गर्भ से एक पुत्र का जन्म हुआ, जिसका नाम नन्दन रखा गया। नन्दन जब थोड़ा बड़ा हुआ तो राजा को आत्मकल्याण का चिंतन आया। नन्दन को राजा बनाने के बाद राजा स्वयं साधु बनकर अपनी आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ गए। कुछ समय बाद नन्दन के मन मंे भी वैराग्य का भाव जागृत हो गया और राजा से ऋषि बन गया। अब नन्दन राजर्षि बन गया। कोई सत्ता, वैभव को त्याग कर साधु बन जाना बहुत बड़ी बात होती है। राजर्षि नन्दन का एक लाख वर्ष का संयम पर्याय रहा। दीक्षा के बाद उन्होंने ग्यारह अंगों का अध्ययन किया। उन्होंने तपस्या करने में लग गए। वे निरंतर मासखमण करने लगे और उन्हें ग्यारह लाख साठ हजार मासखमण कर लिए। इस जन्म में उन्होंने तीर्थंकर नाम गोत्र का बंधन कर लिया। अंत में उन्हें दो महीनों का अनशन भी आया।
वर्तमान में भी हमारे यहां भी व्रत, तपस्या व मासखमण का क्रम रहता है। कितनी चारित्रात्माएं और कितने-कितने श्रावक-श्राविकाएं भी तपस्या करते हैं। आज के समय में किसी की आयुष्य ही सौ वर्ष आ जाए तो वह अपना जीवन धन्य मान सकते हैं। यहां आयुष्य पूर्ण राजर्षि नन्दन की आत्मा दसवें देवलोक में पहुंचती है। वहां भी आयुष्य पूर्ण कर भगवान महावीर की आत्मा अपने अंतिम सत्तईसवें भव में आ रही है। उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र में वे देवलोक से च्यूत होकर गर्भ में पहुंचते हैं, इसी नक्षत्र में एक गर्भ से दूसरे गर्भ में संग्रहित होते हैं। इसी नक्षत्र में उनका जन्म होता है और इसी नक्षत्र में वे मुण्ड होकर अगार से अणगार धर्म के प्रवेश करते हैं। ब्राह्मणकुण्ड नामक गांव में स्थित ऋषभदत्त ब्राह्मण की भार्या देवानंदा के गर्भ में आते हैं। उनकी माता देवानंदा ने 14 महास्वप्न देखे।
आचार्यश्री ने जप दिवस के संदर्भ में पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि जप तो मानों धर्माराधना का सबसे आसान तरीका है। बैठे हैं, लेटे हैं, तब भी जप का प्रयोग किया जा सकता है। वृद्ध व्यक्ति भी जप कर सकता है। जप के माध्यम से भाव व परिणामों की शुद्धि हो सकती है। मुनि चिन्मयकुमारजी ने आचार्यश्री से नौ की तपस्या का प्रत्याख्यान किया।