स्वाध्याय और ध्यान एक दूसरे के पूरक : आचार्य श्री महाश्रमण

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लाडनूं : शांतिदूत आचार्य श्री महाश्रमण जी के पावन सान्निध्य में तेरापंथ की राजधानी लाडनूं में चातुर्मास आराधना का क्रम अनवरत गतिमान है। विविध अधिवेशन, कार्यशालाएं आदि आयोजनों में सम्मिलित होने देश विदेश से हजारों श्रद्धालुओं का आवागमन जारी है। योगक्षेम वर्ष के अंतर्गत आचार्य प्रवर के सान्निध्य में आज प्रेक्षाध्यान दिवस मनाया गया। आचार्य प्रवर ने इस दौरान आत्म साक्षात्कार गीत का संगान किया। एवं सुधर्मा सभा में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को प्रेक्षाध्यान का प्रयोग भी करवाया।

मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण ने कहा – आगम में स्वाध्याय और ध्यान को एक युगल के रूप में स्थापित किया गया है। स्वाध्याय और ध्यान एक-दूसरे के पूरक हैं। स्वाध्याय का साधना के क्षेत्र में विशेष महत्व है और ध्यान की भी अपनी उपयोगिता है। आज 30 सितंबर का प्रेक्षाध्यान दिवस के रूप में मनाया जा रहा है। आश्विन मास हमारे धर्मसंघ के चतुर्थ आचार्य श्रीमद् जयाचार्य के जन्म और उनकी साधना पद्धति से भी जुड़ा है। जयाचार्य एक महान तत्ववेत्ता और अनुशासन के पुरोधा थे, जिन्होंने अपने जीवन के अंतिम वर्षों में स्वयं को विशेष साधना और अध्यात्म में नियोजित किया था। प्रेक्षाध्यान की पद्धति का इतिहास हमारे धर्मसंघ के नवमाधिशास्ता आचार्य श्री तुलसी के समय में प्रारंभ हुआ। आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी ने इस ध्यान पद्धति को एक व्यापक रूप प्रदान किया और इसके विकास में अपना सर्वस्व समर्पित किया। आचार्य महाप्रज्ञ जी के सानिध्य और निर्देशन में ही प्रेक्षाध्यान ने न केवल भारत में बल्कि विदेशों तक अपनी पहचान बनाई। वे स्वयं शिविरों का संचालन करते थे और उन्होंने विपुल साहित्य का सृजन भी किया, जो आज भी साधकों के लिए मार्गदर्शन का स्रोत है।

आचार्यश्री ने आगे कहा कि अणुव्रत, प्रेक्षाध्यान और जीवन विज्ञान ये हमारे धर्मसंघ के तीन मुख्य आयाम हैं जो लोक कल्याण के लिए समर्पित हैं। जैन विश्व भारती जैसा संस्थान आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साधकों के लिए साधना के केंद्र बन चुका हैं। तकनीकी सुविधाओं के माध्यम से अब प्रेक्षाध्यान का प्रसार भी वैश्विक प्रतीत होता है, किंतु मूल रूप से यह आत्म विद्या या अध्यात्म विद्या है। आधुनिक टेक्नोलॉजी केवल एक सपोर्ट है, पर मूल रूप से हमारी आत्म-विद्या आत्मोलोजी बढ़नी चाहिए। वर्तमान में जैन विश्व भारती का प्रेक्षा फाउंडेशन, प्रेक्षा इंटरनेशनल, अध्यात्म साधना केंद्र दिल्ली और प्रेक्षा अकादमी ये संस्थाएं प्रेक्षाध्यान के विकास और आध्यात्मिक उन्नयन में अपना योगदान दे रही हैं। इस साधना में गहराई से उतरने की आवश्यकता है ताकि धर्म संघ का यह अनमोल कार्यक्रम निरंतर प्रगति करता रहे यह काम्य है।

तत्पश्चात जैन विश्व भारती के नवमनोनित अध्यक्ष श्री गौरव मंडोत ने अपने भावों की अभिव्यक्ति दी।