लाडनूं :पाँव-पांव चल हजारों किलोमीटर की पदयात्रा करने वाले, सद्भावना, नैतिकता एवं नशा मुक्ति के संदेश के साथ अहिंसा यात्रा द्वारा जनमानस में सदाचार का संदेश देने वाले अहिंसा यात्रा प्रणेता युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी के पावन सान्निध्य में आज अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस मनाया गया। अणुव्रत उद्बोधन सप्ताह के द्वितीय दिन आचार्य श्री ने अहिंसा के महत्व को व्याख्यायित करते हुए सुधर्मा सभा में प्रेरणा प्रदान की।
मंगल प्रवचन में आचार्यश्री ने कहा कि अहिंसा एक ऐसा तत्व है जिसके अनुसरण के बिना अशांति फैल सकती है। अगर शांति चाहिए तो उसके लिए एक घटक तत्व अहिंसा होता है। शांति है तो अहिंसा है और अहिंसा ही शांति का कारण है। पूजनीय आचार्यश्री महाप्रज्ञजी ने अशांति के माहौल में अहिंसा यात्रा की थी और संदेश दिया था कि शांति से रहना है तो अहिंसा चाहिए, विकास करना है तो भी अहिंसा की अपेक्षा है। हिंसा से ह्रास और पतन की संभावना बनती है, जबकि अहिंसा सुख, शांति और विकास का मार्ग प्रशस्त करती है। साधु का जीवन अहिंसा का जीवन होता है। तन से, मन से और वचन से साधु को हिंसा का वर्जन करना चाहिए। सूक्ष्म जीवों के प्रति भी अहिंसा की भावना हो। वैचारिक अहिंसा और अनेकांतवाद पर जोर देते हुए आचार्य श्री ने कहा जैन दर्शन का जो अनेकांत का सिद्धांत है कि उसमें भी कहीं अहिंसा का दर्शन भी किसी रूप में हो तो हो सकता है। विचारों का भी दुराग्रह नहीं है। अनेकांत का अर्थ यह नहीं है कि सब ठीक है, बल्कि हर बात को किस अपेक्षा से कहा गया है, यह देखना आवश्यक है।
आचार्य प्रवर ने आगे कहा कि अनेकांतवाद का अर्थ संशयवाद नहीं है, बल्कि यह यथार्थवाद के साथ जुड़ा है जहाँ हर बात को उसकी उचित अपेक्षा से देखा जाता है। मूल अहिंसा आत्मा में विद्यमान है। जो अप्रमत्त है वह अहिंसक है और जो प्रमत्त है वह हिंसक है। अणुव्रत व्यावसायिक ईमानदारी, पारिवारिक जीवन में सहिष्णुता की प्रेरणा देता है। अहिंसा का अर्थ केवल दूसरों को शारीरिक कष्ट न देना नहीं है, बल्कि अपने विचारों, व्यवसाय और व्यवहार में ईमानदारी, समता और सहिष्णुता अपनाना है। यह कायरों का नहीं, बल्कि शौर्य और अभय का मार्ग है, जिसे जीवन के हर क्षेत्र में धारण करके ही हम मैत्रीपूर्ण और अहिंसक समाज का निर्माण कर सकते हैं।
कार्यक्रम में लाडनूं नगरपालिका अध्यक्ष श्रीमती प्रवीणा सिसोदिया ने अपने विचार रखे।








