जब दुनिया युद्ध, सैन्य टकराव और वैचारिक ध्रुवीकरण के दौर से गुजर रही हो, तब अहिंसा को केवल इतिहास का अध्याय मान लेना भूल होगी। यह आज मानवीय अस्तित्व की पहली अनिवार्यता है।
दो अक्टूबर को पूरी दुनिया का ध्यान एक ऐसे शाश्वत विचार की ओर जाता है, जिसकी प्रासंगिकता समय के साथ और सघन हुई है। आज जब विश्व के कई हिस्सों में बारूद की गंध फैली है, तब महात्मा गांधी का अहिंसा-संदेश केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि गंभीर आत्ममंथन का आह्वान बन जाता है।
गांधी के लिए अहिंसा मात्र शारीरिक प्रहार न करने तक सीमित नहीं थी। वह सत्य, आत्मसंयम, संवाद और अन्याय के विरुद्ध नैतिक शक्ति थी। गांधी के इस चिंतन पर श्रीमद् राजचंद्र और जैन दर्शन की गहरी छाप थी, जिसने अहिंसा को जीवन के केंद्र में रखा।
इसी परंपरा की जीवंत कड़ी के रूप में आज ‘युगप्रधान’ आचार्य श्री महाश्रमण का कार्य सामने आता है। उनका संदेश किसी पंथ की सीमा में नहीं बंधा; उनका आग्रह व्यक्ति के अंतःकरण से शुरू होकर समाज के नैतिक उत्थान तक जाता है।
आचार्य श्री का जीवन ‘चरैवेति-चरैवेति’ की साधना है। उनके लिए पदयात्रा भौगोलिक दूरी तय करने का माध्यम नहीं, बल्कि आमजन के बीच पहुंचकर चेतना जगाने का मार्ग है। 65 हजार किलोमीटर से अधिक की उनकी पदयात्राओं में सबसे प्रमुख रही ‘अहिंसा यात्रा’। 9 नवंबर 2014 को दिल्ली के लालकिले से शुरू होकर सात वर्षों में 20 राज्यों, नेपाल और भूटान तक 18 हजार किलोमीटर की इस यात्रा ने तीन सूत्र दिए – सद्भावना, नैतिकता और नशामुक्ति।
इस यात्रा की वास्तविक शक्ति उन दूरस्थ गांवों और जनजातीय अंचलों तक पहुंचना था, जो मुख्यधारा से कटे रहते हैं। आचार्य श्री ने वहां सिखाया कि अहिंसा केवल बाहरी हथियारों का त्याग नहीं, बल्कि भीतर पल रहे क्रोध, लोभ, व्यसन और अहंकार पर विजय पाने का संकल्प है। आज जब हथियारों की होड़ से शांति नहीं मिल पा रही, तब सद्भावना, नैतिकता और संयम ही समाज को नई दिशा दे सकते हैं।
गांधी ने अहिंसा को अन्याय के खिलाफ एक सत्याग्रही की तरह जिया; आचार्य महाश्रमण उसे आंतरिक रूपांतरण के जरिए जन-जन के आचरण में ढाल रहे हैं। दोनों के युग अलग हैं, लेकिन चिंतन एक है – भीतर के बदलाव के बिना बाहर की शांति स्थायी नहीं हो सकती।
दो अक्टूबर स्वयं से पूछने का अवसर है कि हम जिस शांति की उम्मीद दुनिया से करते हैं, क्या उसकी शुरुआत हमारे अपने विचार और व्यवहार से हो रही है?
“नचिकेता” मुनि अनुशासन।।








