अनुप्रेक्षा से जीव मोक्ष का कर सकता है वरण : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण

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लाडनूं : जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, शान्तिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने सोमवार को सुधर्मा सभा में आयोजित मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय के माध्यम से पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि प्रश्न किया गया कि अनुप्रेक्षा से जीव क्या प्राप्त करता है? आगमकार ने उत्तर प्रदान करते हुए बताया कि अनुप्रेक्षा से जीव चार गतियों वाले संसार रूपी सागर को पार कर मोक्ष का भी वरण कर सकता है।

स्वाध्याय के पांच अंग बताए गये हैं—वाचना, पृच्छना, परिवर्तना, अनुप्रेक्षा और धर्मकथा। इनमें चौथा अंग है अनुप्रेक्षा। पहले वाचना प्राप्त होती है, जिसमें ज्ञान देने वाला तत्वबोध सिखाता है। जिज्ञासा होने पर पृच्छना (प्रश्न) किया जाता है। उपलब्ध ज्ञान की आवृत्ति व पुनरावर्तन करना चितारना कहलाता है। चौथा अंग है अनुप्रेक्षा। अनुप्रेक्षा का अर्थ है—चिंतन, तत्व चिंतन, अर्थ चिंतन। चिंतन स्थूल स्थिति है, उससे आगे अचिंतन में भी गति हो सकती है। चिंतन में भी एकाग्रता के लिए अचिंतन आवश्यक है। एक विषय को लेकर एकाग्रता से गहराई में जाकर चिंतन करना अनुप्रेक्षा है। संसार और शरीर की अनित्यता का बोध कराने वाली कई गीतिकाएं हैं, जिनके गायन से भी अनुप्रेक्षा हो सकती है।

अनुप्रेक्षा से जीव को छह प्रकार के लाभ हो सकते हैं। पहला लाभ बताया गया कि आयुष्य कर्म को छोड़कर शेष सात अशुभ कर्म प्रकृतियों के गाढ़ बंधन अनुप्रेक्षा करने से शिथिल पड़ सकते हैं। दीर्घकालीन कर्मों की स्थिति जो बहुत लंबी भोगने वाली थी, अनुप्रेक्षा से वह अल्प हो सकती है। कर्मों का जो तीव्र अनुभाव अर्थात कष्टदायक फल आने वाला था, वह मंद पड़ सकता है। कर्मों के बहुत प्रदेशों का अल्प प्रदेशों में रूपांतरण हो सकता है। अनुप्रेक्षा करने से व्यक्ति में अनित्यता और करुणा की भावना भी जागृत हो सकती है। इसी प्रकार जीव चार गतियों वाले इस संसार से मुक्ति भी प्राप्त हो सकती है। इसलिए आदमी स्वाध्याय के अंगों का सदुपयोग करने का प्रयास करना चाहिए।