जयपुर : ज्ञान मनुष्य के जीवन को दिशा देता है, लेकिन उसका वास्तविक मूल्य तभी है, जब वह आचरण में दिखाई दे। सम्यक् ज्ञान के साथ सम्यक् आचार जीवन को सार्थक बनाता है। ज्ञान की साधना का अंतिम लक्ष्य आचरण की पवित्रता होना चाहिए। यह विचार आचार्य श्री महाश्रमण जी के सुशिष्य मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ ने सोमवार को जयपुर के मालवीय नगर स्थित अणुविभा केन्द्र के महाप्रज्ञ सभागार में आयोजित कार्यशाला में व्यक्त किए।
‘ज्ञान का सार है- आचार’ विषय पर आयोजित कार्यशाला को संबोधित करते हुए मुनिश्री ने कहा कि सम्यक् आचार के लिए सम्यक् ज्ञान आवश्यक है। आगमिक परंपरा में पहले ज्ञान और उसके बाद आचरण की बात कही गई है, जो जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि यदि ज्ञान जीवन में सदाचार का निर्माण नहीं करता तो ऐसा ज्ञान अपने उद्देश्य से भटक जाता है।
मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ने कहा कि ज्ञान की प्रतिष्ठा चारित्र के कारण होती है। जीवन में चारित्र का अभाव हो तो ज्ञान भी अपनी प्रभावशीलता खो देता है। इसलिए मनुष्य को ज्ञान अर्जित करने के साथ-साथ अपने चारित्र की सुरक्षा को प्राथमिकता देनी चाहिए। उन्होंने सदाचार को जीवन की वास्तविक शोभा बताते हुए कहा कि ज्ञान तभी प्रकाशमान होता है, जब उसका प्रतिबिंब व्यवहार में दिखाई दे।
इस अवसर पर मुनिश्री संभव कुमार जी महाराज ने कहा कि जिस प्रकार किसी फूल का वास्तविक मूल्य उसकी सुगंध से होता है, उसी प्रकार मनुष्य के जीवन का मूल्य उसके सदाचरण से निर्धारित होता है। बाहरी व्यक्तित्व का आकर्षण समय के साथ समाप्त हो सकता है, लेकिन आंतरिक व्यक्तित्व और चरित्र का प्रभाव स्थायी रहता है। उन्होंने कहा कि चरित्रवान व्यक्ति का ज्ञान ही वास्तव में शोभायमान होता है।
तेरापंथ संगठन के तत्त्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं ने सहभागिता की। कार्यक्रम के दौरान प्रश्नोत्तर सत्र के माध्यम से जिज्ञासाओं का समाधान किया गया। तत्त्वज्ञान के अंतर्गत नामकर्म की चर्चा की गई तथा बारह व्रत कार्यशाला में भोगोपभोग परिमाण व्रत के नियमों को ग्रहण करने के लिए प्रेरित किया गया।
कार्यक्रम में ‘भरत मुक्ति’ गेय व्याख्यान का वाचन भी किया गया, जिसके माध्यम से उपस्थित श्रद्धालुओं में सुविवेक और आत्मचिंतन की भावना को जाग्रत किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ धर्म प्रभु की स्तुति से हुआ। ध्यान, प्रत्याख्यान एवं मंगल संगान के साथ आयोजन का समापन हुआ।








