बच्चा बार-बार जिद करता है? पहले अपनी पैरेंटिंग पर नजर डालिए

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बच्चों का जिद करना उनकी उम्र और विकास का स्वाभाविक हिस्सा है। कभी खिलौने के लिए जिद, कभी मनपसंद खाना न मिलने पर नाराजगी और कभी छोटी-सी बात पर रोना—हर माता-पिता को ऐसे दौर से गुजरना पड़ता है। लेकिन कई बार बच्चे की हर जिद को पूरा करते-करते माता-पिता अनजाने में ऐसी आदतों को बढ़ावा देने लगते हैं, जो आगे चलकर उसके व्यवहार का हिस्सा बन सकती हैं।

बच्चे के व्यवहार को केवल उसकी गलती मानने के बजाय यह समझना भी जरूरी है कि घर का माहौल और माता-पिता की प्रतिक्रिया उसके व्यवहार को किस तरह प्रभावित कर रही है। खासकर छोटी उम्र में बच्चे अपने आसपास के लोगों के व्यवहार से बहुत कुछ सीखते हैं। ऐसे में माता-पिता की कुछ सामान्य आदतें बच्चे को यह सिखा सकती हैं कि रोने, जिद करने या बार-बार अपनी बात दोहराने से वह अपनी इच्छा पूरी करवा सकता है।

1. रोया और मांग पूरी कर दी—तो जिद को मिल गया इनाम

अक्सर माता-पिता बच्चे को रोता हुआ देखकर तुरंत उसकी मांग पूरी कर देते हैं। शुरुआत में यह आसान समाधान लगता है। बच्चा शांत हो जाता है और घर का माहौल भी सामान्य हो जाता है। लेकिन अगर यह बार-बार होने लगे तो बच्चा धीरे-धीरे एक संबंध बना सकता है—रोना या जिद करना यानी अपनी बात मनवा लेना।

मसलन, माता-पिता ने बाजार में खिलौना खरीदने से मना किया, लेकिन बच्चे के रोने और जिद करने के बाद खिलौना खरीद लिया। अगली बार बच्चा इसी तरीके को दोहरा सकता है।

इसलिए हर बार बच्चे को शांत कराने के लिए उसकी मांग मान लेना जरूरी नहीं है। अगर किसी बात के लिए ‘नहीं’ कहा गया है, तो उस फैसले को शांत और स्पष्ट तरीके से बनाए रखना भी परवरिश का हिस्सा है।

2. हर चीज में बहुत सारे विकल्प देना भी बन सकता है परेशानी

बच्चों को चुनाव करने का अवसर देना उनके आत्मविश्वास और निर्णय लेने की क्षमता के लिए अच्छा हो सकता है। लेकिन हर छोटी-बड़ी बात में बहुत सारे विकल्प देना कभी-कभी उल्टा असर डाल सकता है।

खाने का उदाहरण लें। अगर बच्चा हर बार खाना देखकर कहता है कि उसे यह पसंद नहीं और उसके बाद उसे अलग-अलग चीजें बनाकर दी जाने लगें, तो उसे यह आदत हो सकती है कि पसंद की चीज पाने के लिए उसे बस मना करना है।

बच्चे को विकल्प दें, लेकिन सीमित और स्पष्ट। जैसे—“आज दूध लोगे या दही?” इस तरह बच्चे को चुनाव का अधिकार भी मिलता है और माता-पिता की सीमा भी बनी रहती है।

3. दिनचर्या बच्चों को अनुशासन का पहला पाठ पढ़ाती है

बच्चों के लिए एक निश्चित रूटीन केवल सुविधा नहीं, बल्कि सुरक्षा और अनुशासन का माध्यम भी होती है। सोने, उठने, खाने, पढ़ने और खेलने का लगभग तय समय बच्चे को यह समझने में मदद करता है कि दिन कैसे आगे बढ़ेगा।

जब रोज का रूटीन लगातार बदलता रहता है, तो बच्चे के लिए सीमाओं को समझना कठिन हो सकता है। कभी देर रात तक जागना, कभी समय पर खाना न खाना और कभी पढ़ाई या खेलने के नियम बदल देना बच्चे को असंगत संकेत दे सकता है।

इसलिए घर में कुछ सरल और व्यावहारिक नियम तय करना बेहतर है। नियम बहुत अधिक होने की जरूरत नहीं है, लेकिन जो नियम बनाए जाएं, उन्हें माता-पिता लगातार निभाएं।

4. एक ही बात बार-बार कहना—बच्चे को पहली बार सुनने से रोक सकता है

“कितनी बार कहा है…”, “जल्दी करो…”, “अब तो सुन लो…” जैसी बातें कई घरों में रोज सुनाई देती हैं। माता-पिता अक्सर बच्चे को एक ही काम के लिए बार-बार कहते हैं और अंत में परेशान होकर डांटने लगते हैं।

ऐसी स्थिति में बच्चा यह सीख सकता है कि पहली बार कही गई बात पर प्रतिक्रिया देने की जरूरत नहीं है। वह तब तक इंतजार कर सकता है, जब तक माता-पिता की आवाज ऊंची न हो जाए।

इसके बजाय निर्देश छोटा, स्पष्ट और शांत होना चाहिए। बच्चे से उसकी आंखों के स्तर पर बात करना और एक समय में एक ही बात कहना अधिक प्रभावी तरीका हो सकता है।

प्यार का मतलब हर मांग पूरी करना नहीं

बच्चे को प्यार देना और उसकी हर इच्छा पूरी करना दो अलग बातें हैं। एक स्वस्थ परवरिश में प्यार के साथ सीमाएं भी जरूरी होती हैं। बच्चे को यह समझना चाहिए कि उसकी भावनाएं महत्वपूर्ण हैं, लेकिन हर भावना के आधार पर नियम नहीं बदले जाएंगे।

जब बच्चा जिद करे तो उसके गुस्से या रोने को तुरंत दबाने के बजाय उसकी भावना को स्वीकार किया जा सकता है—“मैं समझ रहा हूं कि तुम्हें यह चीज चाहिए और तुम्हें नहीं मिलने पर बुरा लग रहा है, लेकिन अभी यह नहीं मिलेगा।”

इस तरह बच्चा धीरे-धीरे यह सीखता है कि निराशा होना सामान्य है और हर इच्छा का तुरंत पूरा होना जरूरी नहीं।

बच्चे को बदलने से पहले अपना तरीका देखिए

परवरिश में कोई भी माता-पिता हर परिस्थिति में सही नहीं हो सकते। गलती होना स्वाभाविक है। महत्वपूर्ण यह है कि माता-पिता समय रहते यह पहचानें कि कहीं उनकी प्रतिक्रिया बच्चे के व्यवहार को अनजाने में तो मजबूत नहीं कर रही।

बच्चे को जिद्दी कह देना आसान है, लेकिन उसके व्यवहार के पीछे की वजह समझना अधिक जरूरी है। स्पष्ट सीमाएं, नियमित दिनचर्या, शांत संवाद और माता-पिता की निरंतरता बच्चे के व्यवहार को बेहतर दिशा देने में मदद कर सकती है।

आखिरकार, बच्चे केवल हमारी बातें नहीं सुनते—वे हमारे व्यवहार से भी सीखते हैं। इसलिए एक शांत, स्पष्ट और संतुलित घर का माहौल बच्चे के व्यक्तित्व की नींव मजबूत करने में बड़ी भूमिका निभा सकता है।