नई दिल्ली : भारत और रूस के बीच रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण नॉर्दर्न सी रूट (NSR) को लेकर सहयोग बढ़ाने पर बातचीत जारी है। रूस इस आर्कटिक समुद्री मार्ग को यूरोप और एशिया के बीच प्रमुख व्यापारिक गलियारे के रूप में विकसित करने की दिशा में तेजी से काम कर रहा है। भारत ने भी इस मार्ग के जरिए रूस के साथ व्यापार और कनेक्टिविटी को मजबूत करने में रुचि दिखाई है।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने शुक्रवार को साप्ताहिक प्रेस ब्रीफिंग में कहा कि रूस के साथ भारत के बहुआयामी संबंधों में कनेक्टिविटी महत्वपूर्ण हिस्सा है। उन्होंने कहा कि नॉर्दर्न सी रूट को लेकर दोनों देशों के बीच चर्चा चल रही है। जायसवाल ने कहा, “रूस के साथ हमारी बहुआयामी साझेदारी है, जिसमें कनेक्टिविटी एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस विशेष मुद्दे पर भी हमारे साथ चर्चा चल रही है।”
इससे पहले बुधवार को रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भी नॉर्दर्न सी रूट के विकास में भारत की बढ़ती दिलचस्पी का उल्लेख किया था। प्रशांत बेड़े के कर्मियों को संबोधित करते हुए पुतिन ने भारत और चीन को इस रणनीतिक समुद्री गलियारे के विकास में रूस के प्रमुख साझेदारों के रूप में रेखांकित किया।
पुतिन ने कहा कि रूस नॉर्दर्न सी रूट की संभावनाओं का इस्तेमाल करने और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के लिए तैयार है, लेकिन यह सहयोग मौजूदा अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानूनों के दायरे में ही होगा।
यूरोप-एशिया के बीच छोटा समुद्री मार्ग
साइबेरिया के उत्तर में रूस के आर्कटिक तट के साथ गुजरने वाला नॉर्दर्न सी रूट यूरोप और एशिया के बीच पारंपरिक स्वेज नहर मार्ग की तुलना में काफी छोटा समुद्री रास्ता उपलब्ध कराता है। रूस इसे अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए एक भरोसेमंद और बड़े वाणिज्यिक गलियारे के रूप में विकसित कर रहा है।
इसके लिए रूस बंदरगाहों, नेविगेशन सुविधाओं और परमाणु ऊर्जा से संचालित आइसब्रेकरों के बेड़े सहित बुनियादी ढांचे पर बड़े पैमाने पर निवेश कर रहा है।
भारत के लिए यह मार्ग रूस के साथ व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री संपर्क को मजबूत करने का महत्वपूर्ण अवसर माना जा रहा है। यह इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) और चेन्नई-व्लादिवोस्तोक समुद्री मार्ग जैसी मौजूदा कनेक्टिविटी पहलों का पूरक बन सकता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी भारत-रूस कनेक्टिविटी सहयोग को नई गति देने और आर्कटिक क्षेत्र में भारतीय नाविकों को प्रशिक्षण देने की आवश्यकता पर जोर दे चुके हैं। ऐसे में नॉर्दर्न सी रूट पर बढ़ता सहयोग भारत की दीर्घकालिक समुद्री और आर्कटिक रणनीति के लिहाज से अहम माना जा रहा है।








