बनी रहे साधु की अप्रतिबद्धता : सिद्ध साधक आचार्यश्री महाश्रमण

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लाडनूं : जन-जन के मानस को आध्यात्मिक अभिसिंचन प्रदान करने वाले, सद्भावना, नैतिकता व नशामुक्ति की प्रेरणा प्रदान करने वाले जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी विशाल धवल सेना के साथ वर्तमान समय में तेरापंथ की राजधानी लाडनूं में स्थित जैन विश्व भारती परिसर में योगक्षेम वर्ष का महामंगल प्रवास कर रहे हैं। आचार्यश्री के इस प्रवास से वर्ष पर्यंत आयोजित होने वाले सभी संघीय, धार्मिक-आध्यात्मिक आयोजन इसी परिसर में सुसम्पन्न हो रहे हैं। यह सौभाग्य प्राप्त कर लाडनूंवासी अतिशय आह्लादित हैं। जैन विश्व भारती का पूरा परिसर ही नहीं, पूरा लाडनूं नगर श्रद्धालुओं की इस विशेष उपस्थिति से जनाकीर्ण से बना हुआ है। नित्य प्रति आचार्यश्री के श्रीमुख से प्रवाहित होने वाली ज्ञानगंगा जन-जन के मानस को आध्यात्मिक अभिसिंचन प्रदान कर रही है।
शुक्रवार को सुधर्मा सभा में आयोजित प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में युगप्रधान अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी ने उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘अनासक्ति से क्या मिलेगा?’ को आगम के माध्यम से व्याख्यायित करते हुए कहा कि किसी से बंध जाना यह प्रतिबद्धता होती है। बंधने के बाद दुराव होना कठिन होता है। जैसे एक बछड़े को खूंटे से बांध दिया गया है तो वह उससे दूर नहीं जा सकता। आदमी किसी व्यक्ति, वस्तु, स्थान आदि से भी प्रतिबद्धता कर सकता है। साधु को अप्रतिबद्ध रहने का प्रयास करना चाहिए। साधु के जीवन में किसी भी प्रकार की प्रतिबद्धता नहीं होनी चाहिए। साधु को किसी एक नगर में लम्बे समय तक नगर अथवा शहर में नहीं रहने का प्रयास करना चाहिए। कोई शारीरिक विवशता हो तो अलग बात हो सकती है। साधु को रमण करता हुआ ही भला होता है। इसके पीछे भी अप्रतिबद्धता का सूत्र काम करता है।
किसी व्यक्ति, वस्तु, स्थान आदि से प्रतिबद्ध होकर साधु को नहीं रहना चाहिए। जहां प्रतिबद्धता और राग होता है, वहां दुःख भी होता है। इसलिए साधु के लिए अप्रतिबद्धता और अनिवार्य बात होती है। अप्रतिबद्धता से आसक्ति नहीं रहती है। साधु को अकेला विचरण भी करना चाहिए तो काफी सोच-समझकर अलग विहार करने का प्रयास करना चाहिए। विहार भी विवेकपूर्ण ढंग से करने का प्रयास करना चाहिए। मर्यादावली, व हाजरी का वाचन साधु को इसके प्रति जागरूक रहने की प्रेरणा देने वाला है। लेखपत्र भी प्रतिदिन उच्चारण करने वाला है, वह भी प्रेरणा देने वाला है।
साधु की अप्रतिबद्धता बनी रहे, इसका प्रयास होना चाहिए। बाल्यावस्था में साधुता स्वीकार कर लेना और जीवन की अंतिम श्वास तक संयम पर्याय बना रहे तो कितनी बड़ी बात हो सकती है। साधु के पास जो भी अर्जित ज्ञान, ध्यान आदि है, उसे दूसरों को देने और उसे भी अप्रतिबद्धता की ओर ले जाने का प्रयास किया जा सकता है। अप्रतिबद्धता बनी रहती है तो साधु अनासक्त रूप में कहीं भी विचरण कर सकता है।
20 सितंबर को दीक्षा समारोह होगा आयोजित
आचार्यश्री के सान्निध्य में 20 सितंबर को भव्य जैन भगवती दीक्षा समारोह का आयोजन होगा, जिसमें मुमुक्षु बाबूलाल बाफना, मुमुक्षु सुमन नाहटा, मुमुक्षु सुमन बैद, मुमुक्षु रुचिका मालू, मुमुक्षु भावना नाहटा, मुमुक्षु कोमल भंसाली को युगप्रधान आचार्यश्री जैन साधु/साध्वी दीक्षा प्रदान करेंगे।