परम कृपालु थे आचार्यश्री कालूगणी : महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमण

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लाडनूं : अष्टदिवसीय पर्वाधिराज पर्युषण की आराधना, भगवती संवत्सरी व क्षमापना दिवस के आध्यात्मिक एवं भव्य रूप में सुसम्पन्न हुआ। जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, आचार्यश्री महाश्रमणजी की पावन सन्निधि में करीब 450 से भी अधिक साधु-साध्वियों की विराट उपस्थिति के अलावा हजारों-हजारों श्रद्धालुओं ने योगक्षेम वर्ष के दौरान आयोजित होने वाली इस धर्माराधना का पूर्ण लाभ उठाया।
गुरुवार को मुख्य प्रवचन कार्यक्रम का विषय था- ‘आचार्यश्री कालू: परमकृपालु।’ युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आज के निर्धारित विषय को आगम के माध्यम से व्याख्यायित करते हुए कहा कि आज भाद्रव शुक्ला षष्ठी है। जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के अष्टम आचार्यश्री कालूगणीप्रवर के महाप्रयाण की वार्षिकी तिथि है। परम पूजनीय कालूगणी, पंचम आचार्य मघवागणी से दीक्षित हुए थे। उनके सान्निध्य में उन्हें रहने का मौका मिला था। मघवागणी को वीतराग कल्प आचार्य कहा गया है। ऐसे आचार्य की उन्हें सन्निधि प्राप्त हुई। आचार्यश्री कालूगणी, परम पूज्य गुरुदेव तुलसी के गुरु थे। आचार्यश्री तुलसी दीक्षा लेने के बाद बस एक ही आचार्य के पास रहे, वह थे आचार्यश्री कालूगणी। उन्होंने ने ही उन्हें दीक्षा दी और उन्होंने ही उन्हें आचार्य बना दिया। वे करीब ग्यारह वर्षों तक उनके साथ रहे। आचार्यश्री कालूगणी ने मुनि तुलसी को मात्र 22 वर्ष की अवस्था में युवाचार्य बना दिया।
आचार्यश्री कालूगणी परम कृपालु थे। कालूगणी तो मानों माता-पिता के समान थे। उनके द्वारा दीक्षित संतों में कई विद्वान संत हुए। आचार्यश्री कालूगणी के ही सुशिष्य मुनिश्री नथमलजी स्वामी (टमकोर) जो बाद में आचार्यश्री तुलसी के उत्तराधिकारी आचार्यश्री महाप्रज्ञजी के रूप में प्रतिष्ठित हुए। आचार्यश्री कालूगणी का आचार्यकाल करीब 27 वर्षों का रहा। उनका सारा चतुर्मास राजस्थान में ही रहा। मात्र एक चतुर्मास हरियाणा में किया। आचार्यश्री कालूगणी की कृति आचार्यश्री तुलसी थे। कार्यक्रम के मध्य प्रसंगवश साध्वीप्रमुखाजी ने भी आचार्यश्री महाप्रज्ञजी व आचार्यश्री कालूगणी से संबंधित प्रसंग को प्रस्तुत किया।
आचार्यश्री ने आगे कहा कि आचार्यश्री कालूगणी में गंगापुर के रंग भवन को पधारे और वहां लोगों ने कहा कि यह स्थान अच्छा नहीं है, लेकिन उन्होंने रंग भवन को नहीं छोड़ा। वि.सं. 1993 में महाप्रयाण हुआ था। महाप्रयाण को नब्बे वर्ष पूर्ण हो रहा है।
आचार्यश्री ने इस संदर्भ में कहा कि आचार्यश्री कालूगणी की शताब्दी मनानी चाहिए। आचार्यश्री ने पूर्वाचार्यों का स्मरण करते हुए घोषणा करते हुए कहा कि आचार्यश्री कालूगणी की महाप्रयाण शताब्दी का वर्ष संघीय स्तर पर मनाया जाए। वि.सं. 2092 की भाद्रव शुक्ला षष्ठी से वि.सं. 2093 की भाद्रव शुक्ला षष्ठी तक एक वर्ष का समय ‘आचार्य कालूगणी महाप्रयाण शताब्दी वर्ष’ के रूप में मनाया जाए, यह निर्णय किया जा रहा है। यह नौ वर्ष बाद आयोजित होना है। परम पूज्य कालूगणी जैसे आचार्य हमारे धर्मसंघ को मिले थे। मैं ऐसे आचार्यश्री के प्रति अपना श्रद्धार्पण करता हूं। मुनि मर्यादाकुमारजी ने आचार्यश्री से नौ की तपस्या का प्रत्याख्यान किया। पाक्षिक भारतीय समाज ने ‘धर्म-अध्यात्म’ विशेषांक को आचार्यश्री के समक्ष लोकार्पित किया गया। आचार्यश्री ने इस संदर्भ में मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।