चुनाव में गड़बड़ी हुई तो चुप नहीं बैठेंगे, हमारे हाथ बंधे नहीं हैं: सुप्रीम कोर्ट

0

नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि यदि चुनाव प्रक्रिया को असंवैधानिक या अवैध तरीकों से प्रभावित करने की कोशिश की जाती है, तो संवैधानिक अदालतें हस्तक्षेप कर सकती हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि चुनाव प्रक्रिया में सामान्यतः न्यायिक हस्तक्षेप से परहेज किया जाता है, लेकिन निष्पक्ष चुनाव की रक्षा के लिए जरूरत पड़ने पर अदालतों के हाथ बंधे नहीं हैं।

शीर्ष अदालत की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर राजनीतिक विवाद जारी है। हालांकि, यह टिप्पणी आंध्र प्रदेश में स्थानीय निकाय चुनावों के दौरान नामांकन प्रक्रिया में कथित बाधाओं से जुड़ी याचिका की सुनवाई के दौरान की गई।

YSRCP की याचिका पर सुनवाई

जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने आंध्र प्रदेश की प्रमुख विपक्षी पार्टी युवजन श्रमिक रायथू कांग्रेस पार्टी (YSRCP) की याचिका पर सुनवाई की। पार्टी ने आरोप लगाया कि हिंसा और बिगड़ी कानून-व्यवस्था के कारण उसके उम्मीदवारों को शहरी स्थानीय निकाय चुनावों के लिए नामांकन दाखिल करने में बाधाओं का सामना करना पड़ा।

YSRCP का दावा था कि उसके लगभग दो-तिहाई उम्मीदवार नामांकन दाखिल नहीं कर सके। पार्टी ने नामांकन की समय-सीमा बढ़ाने और उम्मीदवारों को चुनाव प्रक्रिया में भाग लेने का उचित अवसर देने की मांग की।

राज्य चुनाव आयोग को निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश राज्य चुनाव आयोग (SEC) से YSRCP की नामांकन की समय-सीमा बढ़ाने संबंधी मांग पर विचार कर उचित निर्णय लेने को कहा। साथ ही, अदालत ने उम्मीदवारों की अंतिम सूची 21 अक्टूबर को जारी नहीं करने और उसके प्रकाशन को 23 अक्टूबर तक टालने का निर्देश दिया।

अदालत ने स्पष्ट किया कि वह चुनाव प्रक्रिया अपने हाथ में नहीं ले रही है, बल्कि राज्य चुनाव आयोग को शिकायत पर विचार करने और आवश्यक निर्णय लेने का निर्देश दे रही है।

स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव लोकतंत्र की बुनियाद

सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा हैं। नामांकन दाखिल करने का अधिकार और अवसर भी निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया का महत्वपूर्ण अंग है।

अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि लोकतंत्र में चुनाव प्रक्रिया के प्रति जनता का विश्वास बनाए रखना बेहद जरूरी है। यदि किसी राजनीतिक दल की ओर से नामांकन में बाधा डालने के आरोपों के समर्थन में दस्तावेज, ज्ञापन और वीडियो जैसे साक्ष्य प्रस्तुत किए जाते हैं, तो अदालत उनकी अनदेखी नहीं कर सकती।

पीठ के अनुसार, संवैधानिक अदालतों की जिम्मेदारी केवल न्यायिक संयम बरतने तक सीमित नहीं है। जरूरत पड़ने पर उन्हें संवैधानिक मूल्यों और चुनाव की निष्पक्षता की रक्षा के लिए अपनी न्यायिक समीक्षा की शक्ति का इस्तेमाल करना चाहिए।

हाई कोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद पहुंची थी पार्टी

YSRCP ने पहले आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट में याचिका दाखिल कर चुनाव के दौरान हिंसा की आशंका को देखते हुए सुरक्षा और अन्य एहतियाती उपायों की मांग की थी। हाई कोर्ट ने 15 अक्टूबर को उसकी याचिका खारिज कर दी थी। नामांकन की समय-सीमा बढ़ाने की मांग पर भी राहत नहीं मिलने के बाद पार्टी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

राज्य सरकार और राज्य चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका का विरोध किया था। हालांकि, शीर्ष अदालत ने उपलब्ध सामग्री के आधार पर प्रथम दृष्टया माना कि नामांकन प्रक्रिया की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए निर्देश देना जरूरी है।

चुनाव प्रक्रिया में न्यायिक हस्तक्षेप पर अहम संदेश

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का मुख्य संदेश यह है कि चुनाव आयोग जैसे स्वतंत्र संवैधानिक संस्थानों को चुनाव कराने की जिम्मेदारी निभाने का अवसर मिलना चाहिए, लेकिन यह स्वतंत्रता चुनाव प्रक्रिया को अवैध या असंवैधानिक तरीकों से प्रभावित करने का आधार नहीं बन सकती।

अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायिक संयम का अर्थ निष्क्रियता नहीं है। यदि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठते हैं और उनके समर्थन में सामग्री पेश की जाती है, तो संवैधानिक अदालतें लोकतांत्रिक व्यवस्था की रक्षा के लिए हस्तक्षेप कर सकती हैं।