दांतों की सेहत भी है स्वास्थ्य का अहम हिस्सा, फिर इंश्योरेंस में इसे पूरी जगह कब मिलेगी?

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मेरे क्लिनिक में लगभग हर सप्ताह एक ऐसा सवाल सुनने को मिलता है, जो मुझे सोचने पर मजबूर कर देता है। जब मैं किसी मरीज को बताती हूं कि उसके दांत में रूट कैनाल ट्रीटमेंट (RCT) की जरूरत है, तो दर्द के बारे में पूछने से पहले उसका सवाल होता है— “डॉक्टर, क्या इसका खर्च मेरी हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी में कवर होगा?”

अक्सर मेरा जवाब होता है—शायद नहीं।

इसके बाद मरीजों की प्रतिक्रिया लगभग एक जैसी होती है। कुछ लोग इलाज करवाने का फैसला कर लेते हैं, कुछ पूछते हैं कि क्या इसे थोड़े समय के लिए टाला जा सकता है, और कुछ कहते हैं कि वे बाद में आएंगे। लेकिन मेरे अनुभव में, यह ‘बाद में’ अक्सर तब आता है, जब परेशानी बढ़ चुकी होती है, दर्द ज्यादा हो जाता है और इलाज का खर्च भी पहले से कहीं अधिक हो जाता है।

ये वही लोग हैं, जो हर साल अपनी हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी का प्रीमियम भरते हैं। उनके पास इंश्योरेंस है, उन्हें दांतों से जुड़ी समस्या भी है, लेकिन जरूरत पड़ने पर दोनों का साथ शायद ही मिल पाता है।

आखिर ऐसा क्यों है कि हम शरीर के बाकी हिस्सों की सेहत को जरूरी मानते हैं, लेकिन दांतों की सेहत को अक्सर अलग नजर से देखते हैं?

विदेशों में मिलती है सुविधा, भारत में अब भी बड़ी कमी

कई विकसित देशों में डेंटल इंश्योरेंस को स्वास्थ्य सेवाओं का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। अमेरिका में बड़ी संख्या में लोगों के पास किसी न किसी रूप में डेंटल कवरेज है। वहीं, जर्मनी और जापान जैसे देशों में सरकारी स्वास्थ्य बीमा व्यवस्था के अंतर्गत भी कई तरह के दंत उपचार शामिल हैं। इनमें कुछ परिस्थितियों में डेंचर और क्राउन जैसे उपचार भी आते हैं।

जर्मनी का उदाहरण खास तौर पर ध्यान देने योग्य है। वहां दंत चिकित्सा में रोकथाम और समय पर इलाज को महत्व देने से बच्चों में दांतों की सड़न जैसी समस्याओं को कम करने में मदद मिली है।

इससे एक अहम बात समझ आती है—इंश्योरेंस का उद्देश्य केवल बीमारी होने के बाद इलाज का खर्च उठाना नहीं होना चाहिए। अगर समय पर जांच और जरूरी उपचार की सुविधा मिले, तो कई समस्याओं को गंभीर होने से पहले ही रोका जा सकता है।

भारत में, हालांकि, डेंटल इंश्योरेंस अब भी आम सुविधा नहीं बन पाया है। बहुत से परिवारों को फिलिंग, रूट कैनाल, क्राउन या डेंचर जैसे उपचारों का खर्च अपनी जेब से उठाना पड़ता है।

## एक ही दिन में इलाज, फिर दांतों के इलाज में अंतर क्यों?

इस समस्या को समझने के लिए हमें हेल्थ इंश्योरेंस की पुरानी व्यवस्था को देखना होगा।

पहले कई पॉलिसियों में इलाज का खर्च तभी मिलता था, जब मरीज को कम से कम 24 घंटे अस्पताल में भर्ती रहना पड़े। लेकिन चिकित्सा विज्ञान के विकास के साथ इलाज के तरीके भी बदले। मोतियाबिंद की सर्जरी और डायलिसिस जैसी कई प्रक्रियाएं अब अस्पताल में लंबे समय तक भर्ती हुए बिना भी की जा सकती हैं।

इसके बाद इंश्योरेंस कंपनियों ने ‘डे-केयर ट्रीटमेंट’ यानी ऐसी चिकित्सा प्रक्रियाओं को कवर करना शुरू किया, जिनके लिए 24 घंटे अस्पताल में रहना जरूरी नहीं होता।

अब जरा दो मरीजों की स्थिति की तुलना कीजिए।

एक मरीज को मोतियाबिंद की सर्जरी करवानी है। वह कुछ घंटों में पूरी हो जाती है और पॉलिसी की शर्तों के अनुसार उसका खर्च कवर हो सकता है।

दूसरे मरीज को दांत में रूट कैनाल और क्राउन की जरूरत है। उसे भी कुछ समय में डेंटल क्लिनिक में इलाज मिल सकता है, लेकिन सामान्य हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी में इसका खर्च अक्सर कवर नहीं होता।

दोनों ही स्थितियों में मरीज को स्वास्थ्य संबंधी परेशानी है। दोनों को इलाज की जरूरत है। फिर भी इंश्योरेंस का लाभ मिलने में इतना अंतर क्यों है?

इसका एक बड़ा कारण यह है कि डेंटल ट्रीटमेंट को लंबे समय तक सामान्य हेल्थ इंश्योरेंस की मुख्य कवरेज से अलग रखा गया। जबकि दांतों के इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती होना जरूरी नहीं होता, और यही बात इसे आधुनिक डे-केयर कवरेज के साथ जोड़ने का आधार बन सकती है।

दांत शरीर का ही हिस्सा हैं। उनकी समस्याएं भी हमारे स्वास्थ्य, खानपान और रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करती हैं। इसलिए अब समय है कि डेंटल केयर को भी स्वास्थ्य बीमा में उचित स्थान दिया जाए।

इलाज का खर्च बढ़ रहा है, लेकिन डेंटल कवर अब भी सीमित है

भारत में स्वास्थ्य सेवाओं का खर्च लगातार बढ़ रहा है। दंत चिकित्सा भी इससे अछूती नहीं है।

आज बेहतर क्वालिटी के मटेरियल, डिजिटल एक्स-रे, आधुनिक उपकरण और इम्प्लांट जैसी सुविधाओं ने इलाज को अधिक प्रभावी बनाया है। लेकिन इन तकनीकों के साथ उपचार की लागत भी बढ़ी है।

कुछ नई हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसियों में अब डेंटल ट्रीटमेंट के लिए सीमित कवरेज मिलने लगा है। कई योजनाओं में यह सीमा लगभग ₹10,000 सालाना हो सकती है, हालांकि वास्तविक कवरेज पॉलिसी के अनुसार अलग-अलग होता है।

यह एक सकारात्मक शुरुआत है, लेकिन कई बार इतना कवर भी पर्याप्त नहीं होता। एक रूट कैनाल और क्राउन के इलाज में ही यह राशि खर्च हो सकती है।

इसी तरह, ब्रेसिज़ का खर्च लगभग ₹20,000 से ₹50,000 और एक डेंटल इम्प्लांट का खर्च करीब ₹28,000 से ₹70,000 तक हो सकता है। वास्तविक लागत मरीज की स्थिति, क्लिनिक, इस्तेमाल होने वाली तकनीक और उपचार की जटिलता पर निर्भर करती है।

ऐसे में सवाल केवल डेंटल इंश्योरेंस उपलब्ध कराने का नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करने का भी है कि उसकी सीमा वास्तविक इलाज के खर्च के अनुरूप हो।

दांतों का इलाज कोई लग्जरी नहीं, जरूरत है

दांतों की समस्याओं को लेकर एक आम धारणा यह है कि डेंटल ट्रीटमेंट का संबंध मुख्य रूप से सुंदरता से है। यह सच है कि कुछ उपचार पूरी तरह कॉस्मेटिक होते हैं, लेकिन दांतों के इलाज का बड़ा हिस्सा सीधे स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता से जुड़ा है।

एक डेंटिस्ट के रूप में मैं अपने क्लिनिक में रोजाना ऐसे उदाहरण देखती हूं।

1. दांतों का टूटना या गिर जाना

जब उम्र बढ़ने के साथ किसी व्यक्ति के कई दांत गिर जाते हैं, तो इसका असर सिर्फ उसकी मुस्कान पर नहीं पड़ता। धीरे-धीरे उसके खाने की आदतें भी बदलने लगती हैं।

कठोर फल, सब्जियां और पोषण से भरपूर कई खाद्य पदार्थ चबाना मुश्किल हो जाता है। परिणामस्वरूप व्यक्ति अपने खानपान में समझौता करने लगता है।

उचित डेंचर यानी नकली दांत इस परेशानी को काफी हद तक कम कर सकते हैं। पुणे के एक डेंटल कॉलेज में किए गए अध्ययन में पाया गया कि पूरे डेंचर लगवाने के बाद मरीजों की चबाने की क्षमता, भोजन का सेवन, वजन और जीवन की गुणवत्ता में सुधार देखा गया।

इसलिए डेंचर को केवल सुंदर दिखने का साधन मानना सही नहीं है। कई लोगों के लिए यह बेहतर खानपान और सामान्य जीवन जीने की जरूरत है।

2. दांतों का टेढ़ा-मेढ़ा होना

टेढ़े या एक-दूसरे पर चढ़े हुए दांतों को अक्सर केवल दिखावट से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन कुछ लोगों के लिए यह समस्या चबाने, दांतों की सफाई और आत्मविश्वास को भी प्रभावित कर सकती है।

विशेषकर किशोरों और युवाओं में, दांतों की बनावट को लेकर झिझक उनके खुलकर मुस्कुराने, बोलने और लोगों से मिलने-जुलने पर असर डाल सकती है।

ऑर्थोडॉन्टिक ट्रीटमेंट, जैसे ब्रेसिज़, जरूरत के अनुसार दांतों की स्थिति सुधारने में मदद कर सकते हैं। इससे दांतों की सफाई आसान हो सकती है और कई मरीजों के आत्मविश्वास में भी सुधार आता है।

हालांकि, हर तरह का ऑर्थोडॉन्टिक उपचार केवल चिकित्सकीय आवश्यकता के आधार पर नहीं होता। इंश्योरेंस में उन मामलों को प्राथमिकता दी जा सकती है, जहां इलाज का स्पष्ट कार्यात्मक या स्वास्थ्य संबंधी लाभ हो।

3. जबड़े में दर्द और TMJ की समस्या

कई लोग सिरदर्द, जबड़े में दर्द, मुंह खोलने में परेशानी या खाना चबाते समय होने वाले दर्द को सामान्य समस्या समझकर नजरअंदाज कर देते हैं।

इन लक्षणों के पीछे कभी-कभी टेम्पोरोमैंडिबुलर जॉइंट (TMJ) से जुड़ी समस्या हो सकती है। यह जोड़ हमारे जबड़े की गतिविधियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

ऐसी समस्याएं व्यक्ति की रोजमर्रा की जिंदगी, नींद, काम करने की क्षमता और मानसिक आराम को प्रभावित कर सकती हैं। कुछ मरीजों को लंबे समय तक दर्द के कारण काम से छुट्टी भी लेनी पड़ सकती है।

इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि दांतों और मुंह की सेहत को केवल बाहरी सुंदरता तक सीमित नहीं किया जा सकता। यह हमारे शारीरिक स्वास्थ्य, आत्मविश्वास और जीवन की गुणवत्ता का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं में भी डेंटल केयर को मिले अधिक जगह

निजी हेल्थ इंश्योरेंस की सीमाओं का असर उन परिवारों पर और ज्यादा पड़ता है, जो महंगे इलाज का खर्च नहीं उठा सकते।

भारत में सरकारी स्वास्थ्य कार्यक्रमों के माध्यम से कई क्षेत्रों में महत्वपूर्ण काम हुआ है। लेकिन आम दंत समस्याओं—जैसे दांतों में सड़न और मसूड़ों की बीमारी—की रोकथाम और उपचार को अभी और मजबूत करने की जरूरत है।

समुदाय स्तर पर ओरल कैंसर की स्क्रीनिंग महत्वपूर्ण है, लेकिन मौखिक स्वास्थ्य का दायरा इससे कहीं अधिक व्यापक है। बड़ी संख्या में लोग दांतों की सड़न, मसूड़ों की बीमारी और दूसरी आम समस्याओं से जूझते हैं।

वर्ष 2021 में राष्ट्रीय मौखिक स्वास्थ्य नीति का एक मसौदा जारी किया गया था। इस क्षेत्र में नीतिगत प्रयासों को आगे बढ़ाने और उन्हें प्रभावी रूप से लागू करने की जरूरत बनी हुई है।

जागरूकता की कमी भी एक बड़ी चुनौती है। बेंगलुरु में किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि लोगों के एक छोटे हिस्से को ही जानकारी थी कि एक प्रमुख सरकारी स्वास्थ्य योजना के अंतर्गत किसी प्रकार की डेंटल कवरेज भी उपलब्ध थी।

जब लोगों को उपलब्ध सुविधाओं की जानकारी ही नहीं होगी, तो वे उनका लाभ कैसे उठा पाएंगे?

जरूरत इस बात की है कि मौखिक स्वास्थ्य को प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं का हिस्सा बनाया जाए और लोगों तक जांच, रोकथाम तथा जरूरी उपचार की सुविधाएं अधिक प्रभावी तरीके से पहुंचाई जाएं।

डेंटल इंश्योरेंस को बेहतर बनाने के लिए क्या होना चाहिए?

एक डेंटिस्ट के रूप में मेरा मानना है कि डेंटल इंश्योरेंस को बेहतर बनाने के लिए कुछ व्यावहारिक कदम उठाए जा सकते हैं।

1. इलाज के वास्तविक खर्च के अनुसार कवरेज**

डेंटल ट्रीटमेंट की कवरेज सीमा ऐसी होनी चाहिए, जो मरीजों को वास्तविक आर्थिक राहत दे सके। समय के साथ इलाज की लागत बढ़ने पर इन सीमाओं की भी समीक्षा की जानी चाहिए।

2. चिकित्सकीय रूप से जरूरी उपचारों को प्राथमिकता**

डेंचर, कार्यक्षमता से जुड़ी ऑर्थोडॉन्टिक समस्याओं और जबड़े के जोड़ों से संबंधित उपचारों को उचित शर्तों के साथ कवरेज में शामिल करने पर विचार किया जाना चाहिए।

3. डे-केयर डेंटल प्रक्रियाओं को उचित स्थान**

यदि किसी चिकित्सकीय रूप से जरूरी प्रक्रिया के लिए अस्पताल में 24 घंटे भर्ती होना आवश्यक नहीं है, तो केवल इसी आधार पर उसे कवरेज से बाहर नहीं रखा जाना चाहिए। डेंटल ट्रीटमेंट के लिए भी स्पष्ट और व्यावहारिक कवरेज नियम बनाए जाने चाहिए।

4. रोकथाम पर भी ध्यान**

नियमित डेंटल चेक-अप और जरूरत के अनुसार प्रोफेशनल क्लीनिंग को कवरेज में शामिल करने से छोटी समस्याओं का समय रहते पता लगाया जा सकता है। इससे भविष्य में होने वाले अधिक महंगे उपचारों की जरूरत कम करने में मदद मिल सकती है।

5. सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं में मौखिक स्वास्थ्य का विस्तार**

ओरल कैंसर स्क्रीनिंग के साथ-साथ दांतों की सड़न, मसूड़ों की बीमारी और अन्य आम दंत समस्याओं की जांच, रोकथाम और उपचार पर भी अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए।

आज आप क्या कर सकते हैं?

जब तक डेंटल इंश्योरेंस अधिक व्यापक नहीं हो जाता, तब तक कुछ छोटे कदम आपके लिए उपयोगी हो सकते हैं।

अपनी हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी रिन्यू करवाते समय उसके डेंटल कवरेज से जुड़े नियम जरूर पढ़ें। यह पता करें कि उसमें डेंटल ट्रीटमेंट या ओपीडी (OPD) से जुड़ा कोई ऐड-ऑन उपलब्ध है या नहीं। यह भी समझें कि कौन-से उपचार कवर हैं, कितनी राशि तक कवर मिल सकता है और किन शर्तों के तहत क्लेम स्वीकार किया जाता है।

सबसे जरूरी बात यह है कि दांतों में दर्द होने या कोई बड़ी परेशानी सामने आने का इंतजार न करें। रोजाना सही तरीके से ब्रश करना, दांतों की सफाई का ध्यान रखना और नियमित अंतराल पर डेंटिस्ट से जांच करवाना लंबे समय तक मौखिक स्वास्थ्य बनाए रखने में मदद कर सकता है।

इंश्योरेंस इलाज के खर्च का बोझ कम करने में मदद कर सकता है, लेकिन समय पर देखभाल और रोकथाम का महत्व हमेशा बना रहेगा।

*दांतों की सेहत भी पूरी सेहत का हिस्सा है। अब समय आ गया है कि हमारी स्वास्थ्य बीमा व्यवस्था भी इस सच्चाई को पूरी तरह स्वीकार करे।

*अपने अगले लेख में मैं कुछ ऐसी आसान रोजमर्रा की आदतों के बारे में बताऊंगी, जो जीवनभर आपके दांतों और मसूड़ों को स्वस्थ रखने में मदद कर सकती हैं।

डॉ. मिली गुप्ता।।